जब हम 'मैं' को खोजते हैं, तब हम जागते हैं
Photo Credit: Pinterest जब हम 'मैं' को खोजते हैं, तब हम जागते हैं हर सुबह जब हम अपनी आँखें खोलते हैं, तो हम दुनिया को एक व्यक्तिगत पहचान के नज़रिए से देखते हैं—एक ऐसा अस्तित्व जिसे हम 'मैं' कहते हैं। यह 'मैं' इच्छाएं करता है, चिंता करता है, निर्णय लेता है, योजनाएं बनाता है और लगातार बाहरी परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया करता है। जब हम इस 'मैं' के साथ देखते हैं, तो हम माया की उस स्वप्निल दुनिया में बंधे रहते हैं—एक ऐसा जटिल भ्रम जहाँ क्षणभंगुर परिस्थितियों को स्थायी सत्य मान लिया जाता है, और अस्थायी भावनाएं ही हमारे अस्तित्व को परिभाषित करने लगती हैं। इस स्थिति में, हमारी चेतना संकुचित रहती है और चंचल मन की सतह के ठीक नीचे स्थित विशाल, शांत आयामों से पूरी तरह अनभिज्ञ रहती है। अहंकार के साथ देखने का अर्थ है बुद्धि के प्रत्येक प्रक्षेपण को ही अंतिम सत्य मान लेना। हम अपने नाम, अपने कार्य, अपने शरीर और अपने अस्थिर विचारों के साथ तादात्म्य बना लेते हैं। परंतु, जिस क्षण हम इस दृष्टि को उलट देते हैं—संसार को अपनी सीमित पहचान से देखने के बजाय, स्वयं इस पहचान के स्...