आध्यात्म में धैर्य
Photo Credit: Pinterest आध्यात्म में धैर्य मुक्ति की अभिलाषा कभी अचानक या अनायास उत्पन्न होने वाला विचार नहीं होती। मोक्ष के प्रति वह शांत, अकथनीय खिंचाव—वह अंतर्मन की बेचैनी जिसे सांसारिकता शांत करने में असमर्थ रहती है—हमारे पूर्व जन्मों के संचित कर्मों और पुरातन आध्यात्मिक पुरुषार्थ का ही फल है। हम इस संसार में उस पावन प्यास को साथ लेकर आते हैं, फिर भी यह शायद ही कभी निर्बाध बह पाती है। यह सांसारिक संस्कारों, कर्तव्यों, इच्छाओं और कर्म बंधनों की घनी परतों के नीचे दबी रहती है। हम मुक्त होने की तड़प तो महसूस करते हैं, किंतु जब तक कृपा नहीं बरसती, मुक्ति का मार्ग ओझल ही रहता है। इस सुप्त तड़प को जगाने के लिए किसी जीवंत, आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु का सानिध्य पाना अनिवार्य होता है। जब पूज्य स्वामी शिवकृपानंदजी जैसे प्रबुद्ध सद्गुरु किसी साधक के जीवन में पदार्पण करते हैं, तो चेतना के बंद कपाट स्वतः खुल जाते हैं। हिमालयन समर्पण ध्यानयोग के माध्यम से स्वामीजी कोई शुष्क सिद्धांत या बौद्धिक वाद-विवाद प्रस्तुत नहीं करते; वे एक जीवंत चैतन्य ऊर्जा प्रदान करते हैं—एक ऐसा प्रत्यक्ष शक्तिपात ...