प्रज्ञा और ध्यान: अंतर्मन के प्रकाश का जागरण
Photo Credit: Facebook प्रज्ञा और ध्यान: अंतर्मन के प्रकाश का जागरण आधुनिक समाज ने लंबे समय से बुद्धि (इंटेलेक्ट) और प्रज्ञा (इंटेलिजेंस) को एक समान मान लेने की भूल की है, जहाँ केवल जानकारियों को जुटाने को ही समझदारी समझ लिया जाता है। हमें यह सिखाया जाता है कि डिग्रियाँ हासिल करना, किताबें याद करना और तार्किक क्षमता को निखारना ही बुद्धिमत्ता का सर्वोच्च रूप है। निःसंदेह, होशियार लोग किताबें पढ़कर और सांसारिक विषयों की जानकारी जुटाकर स्वयं को बहुत ज्ञानी दिखा सकते हैं, परंतु वास्तविक विवेक और ज्ञान बाहर से नहीं, बल्कि अंतर्मुखी होकर ब्रह्मांडीय चेतना में विलीन होने से प्रकट होता है। बुद्धि केवल एक संग्रहकर्ता है; यह दूसरों से उधार लिए गए ज्ञान और विचारों को अपने भीतर संजोती है। इसके विपरीत, वास्तविक प्रज्ञा का अर्थ है उधार ली गई बातों को छोड़कर अपने स्वयं के आंतरिक खजाने की खोज करना। बुद्धि का हिमालय भी आत्मा को रूपांतरित नहीं कर सकता, जबकि प्रज्ञा का एक छोटा सा अंश भी पूरे जीवन को बदल देता है। यह हृदय में एक ज्योति जलाती है जो हमें भीतर से प्रकाशित कर देती है। जैसा कि ओशो ने कहा ...