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सार्वभौमिक चेतना से एकत्व

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  Photo Credit: Pinterest   सार्वभौमिक चेतना से एकत्व   सार्वभौमिक चेतना से एकत्व आध्यात्मिक यात्रा का चरम है। यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अनंत में विलीन हो जाता है। अहंकार और पहचान मिट जाते हैं और केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है। यह एकत्व ध्यान और समर्पण से प्राप्त होता है। ध्यान मन की अशांति को मिटाता है और ऊर्जा को ब्रह्मांड की लय से जोड़ता है। इस संतुलन में “ मैं ” और “ ब्रह्मांड ” का भेद मिट जाता है। श्री शिवकृपानंद स्वामी का हिमालयन समर्पण ध्यान पूर्ण समर्पण सिखाता है। समर्पण में अहंकार ढीला पड़ता है और साधक स्वतंत्रता अनुभव करता है। साधना सरल है — बैठो , समर्पण करो और गुरु ‑ ऊर्जा को प्रवाहित होने दो। यह एकत्व परम वर्तमान है। इसमें हम अनुभव करते हैं कि हम वृक्षों , नदियों , पर्वतों और तारों से अलग नहीं हैं। हम मौन हैं जो सबको जोड़ता है। इस अवस्था में आनंद और निःस्वार्थ प्रेम सहज रूप से प्रकट होते हैं। सार्वभौमिक चेतना...

एकांत की यात्रा

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  Photo Credit: Pinterest एकांत की यात्रा   एकांत की यात्रा सबसे सुंदर मार्गों में से एक है। एकांत को अक्सर अकेलापन समझ लिया जाता है , पर यह विपरीत है। अकेलापन तब होता है जब हम अधूरे महसूस करते हैं। पर एकांत पूर्णता है। यह वह अवस्था है जहाँ हम स्वयं के साथ प्रसन्न रहते हैं। एकांत में प्रकृति हमारी संगिनी बन जाती है। पत्तों की सरसराहट , पक्षियों का गीत , नदियों का प्रवाह और पर्वतों की मौनता हमें स्पष्ट सुनाई देती है। संसार का शोर मिट जाता है और हम ब्रह्मांड की लय से जुड़ जाते हैं। ध्यान एकांत को गहराई देता है। ध्यान में बैठकर हम भीतर की अनंत संभावनाओं को खोजते हैं। शुरुआत में मन विचारों से भरता है , पर निरंतरता से मौन प्रकट होता है। इस मौन में आत्मा प्रकाशित होती है। एकांत निर्भरता से स्वतंत्रता की यात्रा है। अकेलेपन में हम दूसरों पर निर्भर होते हैं। पर एकांत में हम अनुभव करते हैं कि शांति भीतर ही है। हम प्रेम करते हैं ,...

निर्भरता से मुक्ति

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  Photo Credit: Pinterest निर्भरता से मुक्ति   निर्भरता से मुक्ति सबसे गहन स्वतंत्रता है। वर्तमान में जीने का अर्थ है स्वयं में इतना स्थिर होना कि किसी की उपस्थिति या अनुपस्थिति हमारी शांति को प्रभावित न करे। यह उदासीनता नहीं है , बल्कि सच्ची स्वतंत्रता है। जन्म से ही हम दूसरों पर निर्भर होते हैं — परिवार पर प्रेम के लिए , मित्रों पर संगति के लिए , समाज पर पहचान के लिए। जब हमारी शांति इन पर निर्भर हो जाती है , तो दुख उत्पन्न होता है। प्रशंसा हमें प्रसन्न करती है , आलोचना हमें चोट पहुँचाती है। यही निर्भरता है। निर्भरता से मुक्ति का अर्थ जीवन से भागना नहीं है। यह जीवन में पूर्ण भागीदारी है , पर केंद्रित रहकर। हम परिवार और मित्रों से जुड़े रहते हैं , पर हमारी शांति उन पर निर्भर नहीं होती। हम प्रेम करते हैं , पर अधिकार नहीं जताते। हम देखभाल करते हैं , पर आसक्ति नहीं रखते। ध्यान इस स्वतंत्रता का मार्ग है। ध्यान में बैठकर हम साक्षी को अ...