प्रयास से सहजता तक
Photo Credit: Facebook प्रयास से सहजता तक जीवन में हम निरंतर प्रयास करते रहते हैं। सफलता पाने, उपलब्धि हासिल करने, नियंत्रण करने और ध्यान करने का प्रयास। “कर्ता” होने की भावना इतनी गहरी है कि उसे पार करना कठिन हो जाता है। हम मानते हैं कि प्रगति केवल प्रयास से होती है, जबकि आध्यात्मिकता अंततः हमें प्रयास से आगे, सहजता की ओर ले जाती है। कर्ता होने की भावना अहंकार “कर्तापन” पर जीवित रहता है। यह कहता है—“मैं ध्यान कर रहा हूँ, मैं आध्यात्मिक हूँ, मैं आगे बढ़ रहा हूँ।” पर यही “मैं” सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। जब तक हम कर्ता बने रहते हैं, ध्यान संघर्ष ही रहता है। सहजता तब आती है जब हम अहंकार को छोड़कर दिव्य को कार्य करने देते हैं। ध्यान में छोड़ देना ध्यान मन को जबरन शांत करने का प्रयास नहीं है। यह छोड़ देने की साधना है। जब हम स्वयं को दिव्य को समर्पित कर देते हैं, तो समर्पण सहज रूप से होता है। दिव्य स्वयं मार्गदर्शन करता है। ध्यान अब कुछ करने की क्रिया नहीं रहता, बल्कि सहज रूप से घटित होता है। इसी अवस्था में प्रयास मिट जाता है और हम आनंदमय शून्यता में प्रवेश करते हैं। सहजता ही आनं...