ग्रीष्म संक्रांति – आंतरिक विकास का समय
Photo Credit: Instagram ग्रीष्म संक्रांति – आंतरिक विकास का समय कुछ दिनों में हम स्वाभाविक रूप से प्रसन्न, स्पष्ट और केंद्रित महसूस करते हैं, तो कुछ दिनों में बेचैनी, तनाव या थकान का अनुभव होता है। योगशास्त्र बताते हैं कि यह उतार-चढ़ाव संयोग नहीं है। पृथ्वी और सूर्य का सूक्ष्म संवाद हर मनुष्य को गहराई से प्रभावित करता है। ब्रह्मांडीय मोड़ ग्रीष्म संक्रांति केवल वर्ष का सबसे लंबा दिन नहीं है, बल्कि एक गहन ब्रह्मांडीय परिवर्तन है। इस दिन से सूर्य अपनी दक्षिणायन यात्रा आरंभ करता है। जैसे सूर्य की बाहरी तीव्रता चरम पर पहुँचकर घटने लगती है, वैसे ही यह हमें संकेत देता है कि अब बाहरी क्रियाओं से भीतर की ओर मुड़ने का समय है। दक्षिणायन – ग्रहणशीलता का काल योग परंपरा में दक्षिणायन को शुद्धि, कृपा और आंतरिक रूपांतरण का काल माना गया है। यह समय कर्ता बनने का नहीं, बल्कि पात्र बनने का है। बाहर की ओर धकेलने के बजाय भीतर ग्रहण करने का अवसर है। ऊर्जा के उतार-चढ़ाव स्पष्टता और भ्रम के दिन आते-जाते रहते हैं। संक्रांति हमें याद दिलाती है कि यह उतार-चढ़ाव प्रकृति की लय का हिस्सा है। यदि हम इस मोड...