मौन का महत्व
Photo Credit: Pinterest मौन का महत्व विवशता से चेतना की ओर मानव अनुभव प्रायः विवशता में फँसा रहता है। हम या तो अतीत में उलझे रहते हैं—स्मृतियों और पछतावे में, या भविष्य में धकेले जाते हैं—तर्क और अपेक्षाओं में। योगशास्त्र इसे चंद्र और सूर्य नाड़ी के रूप में बताते हैं। इस स्थिति में हम प्रतिक्रिया करते हैं, उत्तर नहीं देते। मौन केवल ध्वनि का अभाव नहीं है। यह मध्य नाड़ी का द्वार है—विचारशून्यता की अवस्था जहाँ चित्त स्थिर होता है। मौन में वह ऊर्जा बचती है जो मानसिक शोर में नष्ट होती है। यही कारण है कि मौन विवशता से चेतना की ओर जाने का साधन है। नियमित ध्यान इस अवस्था को स्थापित करता है और मन को शांत करता है। मौन – सृष्टि और सृष्टिकर्ता से परे मौन ही महाशून्य है—वह स्थिरता जो सृष्टि से पहले है। मनुष्य परमात्मा को अनेक रूप देते हैं, पर मौन हमें निराकार स्वरूप का अनुभव कराता है। परमात्मा अविनाशी ऊर्जा है; शरीर और उसके रूप नश्वर हैं। मौन में साधक सृष्टि और सृष्टिकर्ता दोनों से परे जाकर सार्वभौमिक चेतना के सार को छूता है। यह अनुभव दिखाता है कि मौन शून्यता नहीं, बल्कि अस्तित्व की गर्भस्थ...