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वास्तविकता का स्वरूप

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  Photo Credit: Pinterest वास्तविकता का स्वरूप   हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जो हमें बाहरी रूप से आकर्षित करता है। जन्म के क्षण से ही शिशु को परिवार द्वारा एक नाम दिया जाता है। यह नाम , जो देखने में साधारण लगता है , पहचान का बीज बन जाता है। यही पहला आवरण है जो आत्मा की शुद्ध चेतना को ढक देता है। नाम से अहंकार उत्पन्न होता है —“ मैं अमुक हूँ , इस परिवार का हूँ , इस नगर का हूँ। ” जैसे ‑ जैसे बच्चा बड़ा होता है , शिक्षा , नौकरी , वेतन , संपत्ति और उपलब्धियों की परतें जुड़ती जाती हैं। हर परत अहंकार को मजबूत करती है और माया का जाल गहरा होता जाता है। अहंकार तुलना और अलगाव पर आधारित होता है। यह कहता है , “ मैं तुमसे अलग हूँ , मैं बेहतर हूँ। ” यही अलगाव दुख का मूल है। मन इन भ्रांतियों को लगातार बढ़ाता है। सफलता अहंकार को फुलाती है , असफलता उसे चोट पहुँचाती है , प्रशंसा उसे पोषण देती है और आलोचना उसे हिला देती है। हर स्थिति में मन हमें...