शरीर के दर्द से आत्म-जागृति तक
Photo Credit: Instagram शरीर के दर्द से आत्म-जागृति तक शारीरिक पीड़ा को अक्सर एक बाधा माना जाता है, लेकिन योग मार्ग पर यह शरीर और आंतरिक चेतना के बीच का पहला संवाद है। जब महर्षि पतंजलि ने 'अष्टांग योग' का विधान रचा, तो उसका क्रम अत्यंत सुविचारित था: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इस व्यवस्था में आसन केवल एक शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि सातवें और आठवें चरण—ध्यान और समाधि—की असीम ऊर्जा को संभालने के लिए तैयार की जाने वाली सुदृढ़ नींव है। पतंजलि ने आसन को परिभाषित करते हुए कहा है: स्थिरसुखमासनम् —अर्थात जो स्थिर और सुखदायक हो। ऐसी स्थिरता प्राप्त करने के लिए शरीर को अकड़न, तनाव और पीड़ा की परतों से गुजरना पड़ता है। जब कोई साधक अभ्यास शुरू करता है, तो रीढ़ विरोध करती है, जोड़ों में दर्द होता है और भीतर दबी शारीरिक व भावनात्मक स्मृतियाँ ( ग्रंथियाँ ) उभरती हैं। यह शारीरिक श्रम असल में एक आध्यात्मिक साधना है। योगासन रीढ़ को सीधा करते हैं, प्राण नाड़ियों को खोलते हैं और लंबे समय तक बिना हिले-डुले बैठने की शारीरिक क्षमता प्रदान करते हैं। इस तैयारी के बिना ...