सार्वभौमिक चेतना से एकत्व
Photo Credit: Pinterest सार्वभौमिक चेतना से एकत्व सार्वभौमिक चेतना से एकत्व आध्यात्मिक यात्रा का चरम है। यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अनंत में विलीन हो जाता है। अहंकार और पहचान मिट जाते हैं और केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है। यह एकत्व ध्यान और समर्पण से प्राप्त होता है। ध्यान मन की अशांति को मिटाता है और ऊर्जा को ब्रह्मांड की लय से जोड़ता है। इस संतुलन में “ मैं ” और “ ब्रह्मांड ” का भेद मिट जाता है। श्री शिवकृपानंद स्वामी का हिमालयन समर्पण ध्यान पूर्ण समर्पण सिखाता है। समर्पण में अहंकार ढीला पड़ता है और साधक स्वतंत्रता अनुभव करता है। साधना सरल है — बैठो , समर्पण करो और गुरु ‑ ऊर्जा को प्रवाहित होने दो। यह एकत्व परम वर्तमान है। इसमें हम अनुभव करते हैं कि हम वृक्षों , नदियों , पर्वतों और तारों से अलग नहीं हैं। हम मौन हैं जो सबको जोड़ता है। इस अवस्था में आनंद और निःस्वार्थ प्रेम सहज रूप से प्रकट होते हैं। सार्वभौमिक चेतना...