मानव बनने की यात्रा
Photo Credit: Pinterest मानव बनने की यात्रा ओशो कहते हैं कि मनुष्य पशु और दिव्य के बीच एक सेतु है। यह कथन हमारे मानव होने की यात्रा का सार प्रस्तुत करता है। हम अपनी दोनों प्रकृतियों—सहज प्रवृत्ति और दिव्यता—से परिचित हैं। यही जागरूकता हमें मानव बनाती है, परंतु यही हमें बेचैन भी करती है, संघर्षों से भर देती है और हमें स्वार्थ और उदारता, प्रेम और घृणा, दुर्बलता और शक्ति, आशा और निराशा के चौराहे पर खड़ा करती है। मानव बनने की यात्रा इन विरोधाभासों में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकारने और अपनाने की है। मानव होना जीवन के पूरे आयामों को आत्म‑जागरूकता, भावनाओं और चेतना के माध्यम से अनुभव करना है। यह गहराई से महसूस करने, अर्थ बनाने, सहानुभूति दिखाने और केवल जीवित रहने की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर अपनी पूर्ण क्षमता को प्राप्त करने की क्षमता है। भावनात्मक गहराई और जुड़ाव मनुष्य गहराई से महसूस करने की अद्वितीय क्षमता रखता है। आनंद, दुःख, प्रेम, क्रोध, करुणा—ये सभी भावनाएँ हमारे जीवन को समृद्ध करती हैं और हमें एक‑दूसरे से जोड़ती हैं। भावनात्मक गहराई हमें संबंध बनाने, दूसरों की...