आत्मविश्वास – आध्यात्मिकता में सीमा
Photo Credit: Instagram आत्मविश्वास – आध्यात्मिकता में सीमा दुनिया में आत्मविश्वास को अक्सर सफलता की कुंजी माना जाता है। यह महत्वाकांक्षा, उपलब्धि और पहचान का आधार है। परंतु आध्यात्मिकता में यही आत्मविश्वास बाधा बन जाता है। आध्यात्मिकता आत्म को स्थापित करने की नहीं, बल्कि उसे विलीन करने की यात्रा है। यह समर्पण, आत्मनिवेदन और दिव्य में लीन होने का मार्ग है। “मैं आध्यात्मिक हूँ” इस वाक्य में ही बाधा छिपी है—“मैं।” जब तक अहंकार केंद्र में है, भीतर की यात्रा रुक जाती है। सांसारिक आत्मविश्वास उपलब्धियों और गर्व पर आधारित होता है। यह कहता है, “मैंने किया, मैं जानता हूँ, मैं सक्षम हूँ।” यह व्यक्तित्व को मजबूत करता है। पर आध्यात्मिकता में लक्ष्य “मैं” को मजबूत करना नहीं, बल्कि उसे मिटाना है। जितना हम आत्मविश्वास से चिपके रहते हैं, उतना ही समर्पण कठिन हो जाता है। सच्ची आध्यात्मिक प्रगति विनम्रता से आती है। यह पहचानने से आती है कि हम कर्ता नहीं, बल्कि एक उच्च शक्ति के साधन हैं। यह “मैं कर सकता हूँ” नहीं, बल्कि “तेरी इच्छा पूर्ण हो” है। समर्पण से कृपा का द्वार खुलता है। अहंकार छोड़ने से दिव...