हंसी – अमन (No-Mind) का प्रवेश द्वार
Photo Credit: Facebook हंसी – अमन (No-Mind) का प्रवेश द्वार हम अक्सर गंभीरता को गहराई समझ लेते हैं। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि आध्यात्मिक विकास के लिए गंभीरता, कठोर अनुशासन और भारी तपस्या की आवश्यकता होती है। फिर भी, गंभीरता शायद ही कभी आध्यात्मिक परिपक्वता का लक्षण होती है; यह तो अहंकार का पसंदीदा पहनावा है। अहंकार गंभीरता पर फलता-फूलता है क्योंकि आत्म-महत्व समस्याओं, पुराने पछतावों और कल की निरंतर चिंता से पोषण पाता है। इसके विपरीत, विशुद्ध और हृदयस्पर्शी हंसी मानसिक संस्कारों की जड़ों पर सीधा प्रहार करती है। यह विचारों की कठोर दीवारों को तोड़ती है और सहज रूप से 'अमन' (नो-माइंड) का द्वार बन जाती है। हिमालयन समर्पण ध्यान में, आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु श्री शिवकृपानंद स्वामीजी के करुणामयी मार्गदर्शन में, आध्यात्मिकता कोई शुष्क या बोझिल प्रयास नहीं, बल्कि हमारी स्वाभाविक, आनंदमयी अवस्था का जागरण बनकर सामने आती है। स्वामीजी हमें स्मरण कराते हैं कि भीतर की यात्रा परम सरलता की यात्रा है। यह मानव बुद्धि द्वारा रची गई जटिलताओं से परे आत्मा की पवित्र निर्दोषता की ओर एक सहज बद...