आप अपना संसार स्वयं रचते हैं
Photo Credit: Pinterest आप अपना संसार स्वयं रचते हैं चेतना का दर्पण बाहरी संसार कोई स्थिर वास्तविकता नहीं है; यह हमारे भीतर की स्थिति का प्रतिबिंब है। यदि मन संघर्ष, आलोचना या लोभ से भरा है, तो संसार शत्रुतापूर्ण और प्रतिस्पर्धी लगेगा। परंतु जब भीतर शांति और जागरूकता होती है, तो वही संसार सुंदर और सामंजस्यपूर्ण बन जाता है। पुनर्निर्माण का जाल जब भीतर असंतुलन होता है, तो हम बाहरी समाधान खोजते हैं—स्थान बदलना, नौकरी बदलना, संबंध छोड़ना। पर यदि आंतरिक स्थिति वही रहती है, तो वही पैटर्न और संघर्ष फिर से प्रकट होते हैं। सच्चा परिवर्तन भौगोलिक या परिस्थितिजन्य नहीं, बल्कि मानसिक है। भीतर के साक्षी को जगाना दैनिक सजगता विकसित करें। बाहरी उत्तेजनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय रुकें और मन की आदतों को देखें। थोड़ी‑सी mindfulness हमें अतीत की conditioning को वर्तमान पर थोपने से रोकती है। साक्षीभाव जगाकर हम अचेतन चक्रों से मुक्त होते हैं और सचेत रूप से संसार रचते हैं। जीवन को खेल मानें जीवन कोई भारी संघर्ष नहीं है; यह एक महान खेल है, एक ब्रह्मांडीय मज़ाक। हमारा अधिकांश दुःख...