परिवर्तन का विरोध करना जीवन का विरोध करना है
Photo Credit: Pinterest परिवर्तन का विरोध करना जीवन का विरोध करना है मनुष्य स्थिरता चाहता है। हमें लगता है कि रिश्ते, पहचान, करियर और शरीर हमेशा वैसे ही रहेंगे। परंतु जीवन का नियम स्थायित्व नहीं, परिवर्तन है। परिवर्तन का विरोध करना समुद्र को रोकने या नदी को थामने जैसा है। सुरक्षा स्थिरता में नहीं, बल्कि प्रवाह के साथ तैरना सीखने में है। स्थायित्व का भ्रम हम अक्सर इस भ्रम में जीते हैं कि सब कुछ वैसा ही रहेगा। परंतु जीवन गति है। ठहराव जीवन का इंकार है। पीढ़ियों का अंतर युवा परिवर्तन को उत्साह से अपनाते हैं—नए अनुभव, विकास, भविष्य। उम्र बढ़ने पर हम परिवर्तन से डरने लगते हैं। सच्ची आध्यात्मिक परिपक्वता का अर्थ है उस युवा openness को बनाए रखना, ताकि आराम ठहराव में न बदल जाए। पीड़ा बनाम दुःख परिवर्तन स्वयं दुःख नहीं देता। पीड़ा स्वाभाविक है—हानि, अंत, संक्रमण। पर दुःख प्रतिरोध से पैदा होता है। जब हम पुराने स्वरूपों या रिश्तों से चिपकते हैं, तो भीतर घर्षण होता है। पीड़ा संकेत है; प्रतिरोध उसे दुःख बना देता है। क्षणभंगुरता में जीवन यदि चीजें कभी न बदलतीं, तो जीवन स्थिर तस्वीर होत...