अस्तित्व बनाम बनने की दौड़
Photo Credit: Pinterest अस्तित्व बनाम बनने की दौड़ अपने चारों ओर की दुनिया को ध्यान से देखिए। मिट्टी में रोपा गया एक वृक्ष हर सुबह यह सोचकर नहीं उठता कि अपनी स्थिति कैसे सुधारनी है। वह पास के ओक वृक्ष से आगे निकलने का प्रयास नहीं करता, न ही पतझड़ में पत्ते झड़ने पर दुखी होता है। वह बस गहराई से जड़ें जमाता है, धरती से पोषण लेता है और आकाश की ओर बढ़ता है। वह बढ़ता है, खिलता है और विश्राम करता है। अपनी शुद्ध, निर्विघ्न उपस्थिति में वह सहज और गहन सुंदरता बिखेरता है। वृक्ष कुछ और बनने की कोशिश नहीं करता; वह केवल अस्तित्व में संतुष्ट है। इसके विपरीत, मानव जीवन एक अंतहीन चक्र बन गया है— बनने का चक्र। बचपन से ही हमें यह सिखाया जाता है कि हमारी कीमत आज हम जो हैं उससे नहीं, बल्कि कल हम क्या हासिल करेंगे उससे तय होती है। हम अपने आदर्श स्वरूप की कल्पना करते हैं—अधिक सफल, अधिक शांत, अधिक ज्ञानी, अधिक परिष्कृत—और जीवनभर इन मानसिक प्रक्षेपणों का पीछा करते रहते हैं। यह निरंतर प्रयास हमें उस स्थिति में डाल देता है जहाँ हम वर्तमान में जो हैं उससे असंतुष्ट रहते हैं और भविष्य की ओर भागते रहते हैं। ...