संसार एक माया है
Photo Credit: Pinterest संसार एक माया है हिमालय के ऋषि-मुनियों ने सदैव कहा है कि इन्द्रियों से दिखाई देने वाला संसार परम सत्य नहीं है। यह एक माया है—एक भव्य खेल, जो मन को उलझाकर उसे चंचल बनाए रखता है। जब तक मनुष्य यह मानता है कि संसार वास्तविक है, तब तक उसका मन उसी के पीछे भागता रहेगा, छायाओं और क्षणिक सुखों का पीछा करता रहेगा। यह दौड़ कभी शांति नहीं देती, क्योंकि बाहर की ओर भागता हुआ मन कभी स्थिर नहीं होता। मन का स्वभाव ही चंचल है। वह एक विचार से दूसरे विचार तक, एक इच्छा से दूसरी इच्छा तक दौड़ता रहता है। जितना हम बाहरी संसार को वास्तविक मानते हैं, उतना ही मन उसकी आकर्षणों में उलझता है। धन, संबंध, उपलब्धियाँ और वस्तुएँ—सब स्थायी प्रतीत होती हैं, परंतु क्षणभंगुर हैं। मन उनसे चिपकता है और इस चिपकन में वह अपने भीतर के शाश्वत सत्य से दूर हो जाता है। ध्यान ही वह मार्ग है जो हमें इस माया से पार ले जाता है। जीवित गुरु, जैसे शिवकृपानंद स्वामीजी , के मार्गदर्शन में ध्यान मन को भीतर की ओर ले जाने का शक्तिशाली साधन बन जाता है। गुरु आवश्यक हैं, क्योंकि मन स्वयं अपनी जाल से मुक्त नहीं हो सकता...