गुरु कभी हमारा हाथ नहीं छोड़ते
Photo Credit: Pinterest गुरु कभी हमारा हाथ नहीं छोड़ते सृष्टि के इस विशाल भवसागर में आत्मा की अंतहीन यात्रा के दौरान अनगिनत जन्म और मृत्यु पानी पर उठने वाली लहरों की तरह आते और जाते रहते हैं। फिर भी, इस निरंतर भटकाव के बीच एक ऐसा अलौकिक और परिवर्तनकारी क्षण आता है जब साधक का मिलन एक सच्चे, जीवित सद्गुरु से होता है। जब कोई सद्गुरु से दीक्षा प्राप्त करता है, तो एक शाश्वत और अटूट संबंध स्थापित हो जाता है। यह शब्दों में बंधा कोई साधारण वचन नहीं है, बल्कि आत्मा के साथ रचा गया एक पावन अनुबंध है। एक बार जुड़ जाने के बाद, यह बंधन समय की सीमाओं से परे जाकर तब तक जन्म-जन्मांतर तक बना रहता है जब तक कि साधक पूर्णतः मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त न कर ले। जब कोई पूज्य श्री शिवकृपानंद स्वामीजी जैसे आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु से दीक्षा प्राप्त करता है और हिमालयन समर्पण ध्यान के पावन मार्ग पर कदम रखता है, तो यह सत्य केवल दर्शन न रहकर एक जीवंत अनुभूति बन जाता है। मौन में बैठकर, हिमालय के ऋषियों के सूक्ष्म ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ते ही साधक को सद्गुरु के साथ अपने गहरे और अडिग संबंध का बोध होने लगता है। गुरु...