जैसी भावना, वैसा स्वरूप
Photo Credit: QuoteFancy जैसी भावना, वैसा स्वरूप मानव जीवन का अधिकांश हिस्सा हमारे सूक्ष्म शरीर के भीतर चलने वाले मौन संवाद से निर्धारित होता है। प्रत्येक क्षण हम विचारों को प्रक्षेपित करते हैं, मनोभावों को धारण करते हैं और अपने आस-पास के संसार के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। फिर भी, जीवन के अधिकांश समय हम अपने वास्तविक स्वरूप से पूरी तरह अनभिज्ञ होकर मानसिक भ्रम के जाल में फंसे रहते हैं। हम सामाजिक मुखौटे पहन लेते हैं, सामूहिक चिंताओं को अपना बना लेते हैं और यांत्रिक प्रतिक्रियाओं को ही वास्तविक भावना समझने की भूल कर बैठते हैं। आंतरिक अंधकार की इस अवस्था में हमारी भावनाएं विकृत हो जाती हैं; वे हमारे भीतर विद्यमान दिव्य चैतन्य को प्रतिबिंबित करने में असमर्थ रहती हैं। इसके विपरीत, वे केवल बाहरी अशांति और कर्म संस्कारों को ही दर्शाती हैं। भ्रम के इस कुहासे से निकलकर दिव्य स्पष्टता की ओर बढ़ना आत्मा के जागरण की मांग करता है। पूज्य श्री शिवकृपानंदजी जैसे आत्म-साक्षात्कारी आध्यात्मिक सद्गुरु की अनुकंपा और स्नेहमयी मार्गदर्शन में यह परिवर्तन कोई अमूर्त दार्शनिक विचार न रहकर एक ज...