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समर्पण ध्यानयोग के माध्यम से चंद्र ऊर्जा का संचयन

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  Photo Credit:Rashiratanbhagya   समर्पण ध्यानयोग के माध्यम से चंद्र ऊर्जा का संचयन प्राचीन ऋषियों से लेकर आधुनिक विचारकों तक, मानवता लंबे समय से रात्रि के आकाश में चंद्रमा को विस्मय और श्रद्धा से देखती आई है। चंद्रमा शांत रहकर पृथ्वी की लय को संचालित करता है; उसका निरंतर गुरुत्वाकर्षण खिंचाव विशाल महासागरों में शक्तिशाली ज्वार-भाटे उत्पन्न करता है। लेकिन हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि जो ब्रह्मांड बाहर है, वही सूक्ष्म रूप में हमारे भीतर भी प्रतिबिंबित है। हमारी पृथ्वी और मानव शरीर—दोनों ही लगभग 70% जल से निर्मित हैं। यदि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण और ऊर्जावान खिंचाव दिन में दो बार खरबों गैलन समुद्री जल को हिला सकता है, तो स्वाभाविक रूप से यह हमारे भीतर के जल-तत्व में भी सूक्ष्म और गहरे कंपन उत्पन्न करता है। मानव तंत्र में जल हमारे भावों, तंत्रिका द्रव्यों और उन सूक्ष्म ऊर्जा-मार्गों से गहराई से जुड़ा है जिनसे होकर प्राण ऊर्जा प्रवाहित होती है। पूर्णिमा के दौरान यह ऊर्जा-प्रवाह अपने चरम पर पहुंच जाता है। जिस प्रकार समुद्र तटों पर ऊंची लहरें उठती हैं, उसी प्रकार हमारी आंतरिक ऊर्जा च...

'मैं' वास्तव में क्या दर्शाता है?

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  Photo Credit: Instagram 'मैं' वास्तव में क्या दर्शाता है? मानव भाषा में 'मैं' से अधिक दृढ़ता, आवृत्ति और भावना के साथ कोई अन्य शब्द नहीं बोला जाता। यह वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द संपूर्ण मानवीय अनुभव घूमता है। हर महत्वाकांक्षा, हृदय-विदारक आघात, विजय और शिकायत इसी छोटे से सर्वनाम से बंधी है। फिर भी, अपनी जुबान पर इसके निरंतर प्रवाह के बावजूद, शायद ही कोई इसके वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करता है। 'मैं' वास्तव में क्या दर्शाता है? इसका उत्तर एक गहन विरोधाभास प्रस्तुत करता है: 'मैं' शब्द मनुष्य के सबसे बड़े भ्रम और उसके परम सत्य—दोनों को व्यक्त कर सकता है। यह कौन सा रूप प्रकट करेगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी दृष्टि किस ओर है—क्या हम बाहर संसार की ओर देख रहे हैं या अपने अस्तित्व के मूल स्रोत की ओर अंतर्मुखी हैं। सामान्य, सांसारिक अर्थ में 'मैं' अहंकार का प्रतीक है। जब हमारी चेतना बाहर की ओर केंद्रित होती है, तब हम 'माया' (भ्रम) के प्रभाव में जीवन जीते हैं। इस स्थिति में 'मैं' क्षणभंगुर और बाहरी उपाधियो...

निस्वार्थ गुरुकार्य करना

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  Photo Credit: LinkedIn निस्वार्थ गुरुकार्य करना आध्यात्मिक जगत में गुरुकार्य—सद्गुरु की पावन सेवा—करना कोई साधारण कार्य या प्रशासनिक दायित्व नहीं है; यह एक अत्यंत गहन आध्यात्मिक साधना है। पूज्यपाद श्री शिवकृपानन्द स्वामीजी के पावन सानिध्य में हिमालयन समर्पण ध्यान के मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए गुरुकार्य आंतरिक रूपांतरण का सीधा माध्यम है। यह वह तपोभूमि है जहाँ आत्मा विशुद्ध होती है, संचित कर्म क्षीण होते हैं और चेतना का स्तर ऊंचा उठता है। जब हम सद्गुरु के कार्य में रत होते हैं, तो हम केवल स्थूल जगत में कार्य नहीं कर रहे होते। हम सीधे सद्गुरु के शक्तिशाली और सूक्ष्म ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। जब तक हमारे कर्म विशुद्ध समर्पण और निष्कपट भाव से होते हैं, यह दिव्य ऊर्जा प्रवाह निर्बाध रूप से बहता रहता है। सेवा में समर्पित प्रत्येक क्षण और प्रत्येक प्रयास उस माध्यम की तरह कार्य करता है जिससे आत्मा कई जन्मों के संचित संस्कारों से मुक्त होकर शुद्ध हो जाती है। इस निस्वार्थ अवस्था में साधक एक सहज भारहीनता का अनुभव करता है—बिना किसी थकान के कार्य होते चले जाते हैं, बाधाएं स्वतः वि...

सद्गुरु के सानिध्य में व्यक्ति विचारशून्य हो जाता है

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  Photo Credit: Instagram सद्गुरु के सानिध्य में व्यक्ति विचारशून्य हो जाता है सदियों से प्राचीन ग्रंथों और आत्म-साक्षात्कारी संतों ने एक जीवित सद्गुरु के प्रभामंडल में मौजूद दिव्य शक्ति का वर्णन किया है। वे बताते हैं कि कैसे किसी सिद्ध महापुरुष के पावन सानिध्य में आते ही मानवीय बुद्धि की निरंतर चंचलता स्वतः शांत हो जाती है। कई साधकों की तरह, मैंने भी इन बातों को बड़ी श्रद्धा के साथ पढ़ा था और केवल बौद्धिक स्तर पर ही समझा था। किंतु शब्द तब तक मात्र सिद्धांत रहते हैं जब तक कि प्रत्यक्ष अनुभूति विश्वास को अटूट निष्ठा में न बदल दे। मेरे जीवन में यह दिव्य मोड़ तब आया जब मेरी पहली बार हिमालयन समर्पण ध्यान के प्रणेता, पूज्यपाद श्री शिवकृपानन्द स्वामीजी से प्रत्यक्ष भेंट हुई। यह ऐतिहासिक भेंट पावन भूमि नेवासा में हुई, जहाँ मैं ट्रस्ट के प्रबंध मंडल (मैनेजमेंट बोर्ड) के एक सदस्य के रूप में गया था। स्वामीजी के समक्ष उपस्थित होने से पहले, हमारे मन अपनी सामान्य सांसारिक स्थिति में थे—विश्लेषणात्मक, सतर्क और प्रशासनिक दायित्वों, जिम्मेदारियों तथा व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों में उलझे हुए। प्रबं...

देह-भाव की सीमा को पार करना

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  Photo Credit: Tony Kane MindHealth and Awareness देह-भाव की सीमा को पार करना इस भौतिक संसार में जन्म लेते ही हमारे कंडीशनिंग (संस्कार निर्माण) की एक व्यापक प्रक्रिया शुरू हो जाती है। हम विशुद्ध, निराकार चेतना के रूप में आते हैं, लेकिन तुरंत ही हमारे ऊपर बाहरी पहचान की परतें चढ़ा दी जाती हैं। हमें एक नाम दिया जाता है, एक परिवार से जोड़ा जाता है, धर्म की पहचान दी जाती है, और एक विशेष शहर, राज्य तथा देश की सीमाओं में बांध दिया जाता है। हमें सिखाया जाता है कि क्या 'हमारा' है और क्या 'दूसरों' का, हमारी सीमाएं कहाँ से शुरू होती हैं और कहाँ समाप्त होती हैं। अनजाने में, हम इन बाहरी लेबलों को ही अपना वास्तविक सत्य मान लेते हैं। हम दर्पण में देखते हैं और स्वयं की पहचान पूरी तरह से उस साधन यानी भौतिक शरीर से कर बैठते हैं, और भीतर विराजमान मौन, दिव्य सारथी को भूल जाते हैं। यह गहरी जड़ें जमा चुकी पहचान ही देह-भाव (शरीर चेतना) का मूल कारण है। देह-भाव में जीना हमें एक गहरे भ्रम में फंसा देता है। चूंकि यह भौतिक शरीर नश्वर, क्षणभंगुर और समय के आधीन है, इसलिए इससे बंधा जीवन निरंतर भय, ...

ध्यान आपको सुख और शांति से परे ले जाता है

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  Photo Credit: Rise||Love ध्यान आपको सुख और शांति से परे ले जाता है आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ में मनुष्य दो अमूल्य खजानों की खोज में अपना पूरा जीवन बिता देता है: सुख और शांति। फिर भी, जिस नजरिए से हम इन्हें ढूंढते हैं, वही मूल रूप से भ्रामक है। भौतिक संसार में सुख और शांति लगभग हमेशा हमारी इच्छाओं, आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं से बंधे होते हैं। हम इस निरंतर भ्रम में जीते हैं कि तृप्ति बस अगले मोड़ पर खड़ी है—किसी नई वस्तु की खरीद, पदोन्नति, लक्ष्य की प्राप्ति या किसी अप्रिय परिस्थिति के हल होने में। हम खुद से कहते हैं, "एक बार मुझे यह मिल जाए, तो मैं वास्तव में सुखी हो जाऊंगा; एक बार यह समस्या सुलझ जाए, तो मुझे शांति मिल जाएगी।" इसी विश्वास के साथ हम प्रार्थना करते हैं, प्रयास करते हैं और अक्सर उन चीजों को पा भी लेते हैं जिनकी हमें चाह थी। लेकिन उस आरंभिक राहत के बाद क्या होता है? क्षणिक संतुष्टि मिलती है, जो जल्द ही नई इच्छाओं के अंकुर फूटने से ओझल हो जाती है। मन अपनी अपेक्षाओं को फिर से बदल देता है—एक नया अभाव, एक नई चिंता और एक नई महत्वाकांक्षा जन्म ले लेती है। यह एक अंतह...

जैसी भावना, वैसा स्वरूप

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  Photo Credit: QuoteFancy जैसी भावना, वैसा स्वरूप मानव जीवन का अधिकांश हिस्सा हमारे सूक्ष्म शरीर के भीतर चलने वाले मौन संवाद से निर्धारित होता है। प्रत्येक क्षण हम विचारों को प्रक्षेपित करते हैं, मनोभावों को धारण करते हैं और अपने आस-पास के संसार के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। फिर भी, जीवन के अधिकांश समय हम अपने वास्तविक स्वरूप से पूरी तरह अनभिज्ञ होकर मानसिक भ्रम के जाल में फंसे रहते हैं। हम सामाजिक मुखौटे पहन लेते हैं, सामूहिक चिंताओं को अपना बना लेते हैं और यांत्रिक प्रतिक्रियाओं को ही वास्तविक भावना समझने की भूल कर बैठते हैं। आंतरिक अंधकार की इस अवस्था में हमारी भावनाएं विकृत हो जाती हैं; वे हमारे भीतर विद्यमान दिव्य चैतन्य को प्रतिबिंबित करने में असमर्थ रहती हैं। इसके विपरीत, वे केवल बाहरी अशांति और कर्म संस्कारों को ही दर्शाती हैं। भ्रम के इस कुहासे से निकलकर दिव्य स्पष्टता की ओर बढ़ना आत्मा के जागरण की मांग करता है। पूज्य श्री शिवकृपानंदजी जैसे आत्म-साक्षात्कारी आध्यात्मिक सद्गुरु की अनुकंपा और स्नेहमयी मार्गदर्शन में यह परिवर्तन कोई अमूर्त दार्शनिक विचार न रहकर एक ज...