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औषधि के रूप में ध्यान

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  Photo Credit: Pinterest औषधि के रूप में ध्यान ध्यान ही आंतरिक कल्याण की एकमात्र औषधि है। शरीर को भौतिक उपचार की आवश्यकता हो सकती है , पर आत्मा शांति और स्वतंत्रता चाहती है। ध्यान ही वह साधन है जो अशांति को मिटाकर आत्मा को प्रकाशित करता है। ध्यान चक्रों को शुद्ध करता है और ऊर्जा को सार्वभौमिक ऊर्जा से जोड़ता है। इस संतुलन में अशांति मिटती है और हम वर्तमान में स्थिर होते हैं। मन स्वभाव से चंचल है। यह कहानियाँ और इच्छाएँ बनाता है। ध्यान इस अशांति को मिटाता है और साक्षी को प्रकट करता है। श्री शिवकृपानंद स्वामी का हिमालयन समर्पण ध्यान पूर्ण समर्पण सिखाता है। समर्पण में अहंकार ढीला पड़ता है और मौन प्रकट होता है। साधक अनुभव करता है कि विचार वास्तविक आत्मा से अलग हैं। वे केवल बादल हैं , जबकि चेतना आकाश है। ध्यान धीरे ‑ धीरे पर गहराई से काम करता है। शुरुआत में केवल क्षणिक शांति मिलती है। पर निरंतरता से साधना गहराती है। चक्र शुद्ध ह...

अनुशासन और सरलता

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  Photo Credit: Pinterest अनुशासन और सरलता अनुशासन और सरलता जागरूकता के दो स्तंभ हैं। अनुशासन के बिना जागरूकता क्षणिक रहती है और सरलता के बिना जागरूकता धुंधली हो जाती है। वर्तमान में जीने के लिए दोनों आवश्यक हैं। अनुशासन कठोरता नहीं है , बल्कि निरंतरता है। यह जीवन की लय है जो हमें वर्तमान में स्थिर रखती है। प्रातः उठना , प्रतिदिन ध्यान करना , सजगता से भोजन करना और सरलता से जीना बोझ नहीं हैं , बल्कि स्थिरता और शांति लाते हैं। सुबह का समय शुद्ध होता है और ध्यान के लिए उपयुक्त होता है। ध्यान में अनुशासन का अर्थ मन को जबरन शांत करना नहीं है , बल्कि बार ‑ बार अभ्यास में लौटना है। यही निरंतरता मन को बदल देती है। भोजन में अनुशासन भी आवश्यक है। भोजन केवल शरीर का ईंधन नहीं है , यह चेतना को भी प्रभावित करता है। जब हम सजगता से खाते हैं और सरलता चुनते हैं , तो शरीर और आत्मा दोनों पोषित होते हैं। अनुशासन का अर्थ संतुलन है , न कि वंचना। सरलत...