दूसरों की आलोचना? पहले भीतर देखो!
Photo Credit: Facebook दूसरों की आलोचना? पहले भीतर देखो! आलोचना मानव जीवन का सामान्य हिस्सा बन गई है। हम अक्सर दूसरों की गलतियाँ निकालते हैं, उनके कर्मों पर प्रश्न उठाते हैं या उनकी कमियों को उजागर करते हैं। लेकिन यदि हम ठहरकर चिंतन करें, तो एक गहरा सत्य सामने आता है: दूसरों की आलोचना अक्सर हमारे अपने दोषों का प्रतिबिंब होती है। जब हम आलोचना करते हैं, तो हमें लगता है कि हम किसी और का मूल्यांकन कर रहे हैं। पर वास्तव में हम अपने ही कमजोरियों, असुरक्षाओं और अधूरेपन को बाहर प्रक्षेपित कर रहे होते हैं। जो कठोरता हम दूसरों में देखते हैं, वह हमारी अपनी कठोरता हो सकती है। जो अधीरता हम किसी और में निंदा करते हैं, वही अधीरता हमारे भीतर भी हो सकती है। इसलिए निर्णय लेने से पहले भीतर देखना बुद्धिमानी है। ध्यान इस आत्मचिंतन की प्रक्रिया में हमारी सहायता करता है। जब हम मौन में बैठते हैं, तो हम मन की गतिविधियों को देखना शुरू करते हैं। हम देखते हैं कि मन कितनी जल्दी निर्णय करता है, कितनी आसानी से प्रतिक्रिया करता है और कितनी बार प्रक्षेपण करता है। इन प्रवृत्तियों को देखकर हमें स्पष्टता मिलती है। ...