मासूमियत और बेपरवाह हंसी
Photo Credit: Facebook मासूमियत और बेपरवाह हंसी हम अक्सर जीवन को ऐसे जीते हैं मानो यह कोई थका देने वाला सौदा हो। बचपन के शुरुआती दिनों से लेकर वयस्क होने तक, समाज हमें सतर्क, हिसाब-किताब रखने वाला और गंभीर होना सिखाता है। हम अहंकार, महत्वाकांक्षा और पहचान के भारी कवच बना लेते हैं, और भूलवश यह मान बैठते हैं कि आत्म-महत्व ही बुद्धिमत्ता है। फिर भी, मानसिक संस्कारों की इन कठोर परतों के नीचे हमारा विस्मृत सत्य छिपा है—एक बालक का सहज आनंद और स्वाभाविक पवित्रता। हिमालयन समर्पण ध्यान में, आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु श्री शिवकृपानंद स्वामीजी के पावन मार्गदर्शन में, हम यह अनुभव करते हैं कि आध्यात्मिक विकास ज्ञान का संचय नहीं, बल्कि व्यर्थ को विस्मृत करने (unlearning) की एक गहन प्रक्रिया है। स्वामीजी सिखाते हैं कि वास्तविक अंतर्यात्रा किसी कठिन तपस्या या मानसिक संघर्ष की मांग नहीं करती। इसके विपरीत, यह केवल पूर्ण और निःशर्त समर्पण मांगती है। जब कोई साधक अपने संशयों, बुद्धि, पूर्व संस्कारों और हठी अहंकार के बोझ को गुरु चरणों में समर्पित कर देता है, तब भीतर एक चमत्कार घटित होता है: हम अंदर से ...