भीतरी अशांति को मौन करना
Photo Credit: Pinterest भीतरी अशांति को मौन करना आधुनिक जीवन में अशांति हमारी मौन साथी बन गई है। हम शोर से घिरे रहते हैं—बाहरी विकर्षण, अंतहीन इच्छाएँ और निरंतर दौड़। लेकिन इस शोर के पीछे एक गहरा सत्य है: जो अशांति हम बाहर महसूस करते हैं, वह भीतर की अशांति का ही प्रतिबिंब है। इस भीतरी हलचल को शांत करने के लिए हमें भीतर जाना होगा, और ध्यान ही इसकी कुंजी है। ध्यान केवल विश्राम का अभ्यास नहीं है; यह हमारी आंतरिक वास्तविकता को देखने की कला है। जब हम मौन में बैठते हैं, तो हम मन की बेचैन गतिविधियों को देखना शुरू करते हैं—तेज़ी से दौड़ते विचार, उमड़ती भावनाएँ, और इच्छाएँ जो हमें बाहर की ओर खींचती हैं। प्रारंभ में यह जागरूकता असहज लग सकती है, लेकिन यही रूपांतरण का द्वार है। बिना निर्णय किए देखने से हम अशांति की जड़ को समझने लगते हैं। बाहरी संसार हमें लगातार भौतिक लाभ, उपलब्धियों और संपत्ति के माध्यम से सुख का वादा करता है। लेकिन जैसा कि स्वामी शिवकृपानंदजी साधकों को बताते हैं, बाहर वास्तव में कुछ भी नहीं है। यह "कुछ नहीं" उन सतही लाभों को दर्शाता है जिन्हें हम लगातार पीछा करते रहत...