'मैं' वास्तव में क्या दर्शाता है?
Photo Credit: Instagram 'मैं' वास्तव में क्या दर्शाता है? मानव भाषा में 'मैं' से अधिक दृढ़ता, आवृत्ति और भावना के साथ कोई अन्य शब्द नहीं बोला जाता। यह वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द संपूर्ण मानवीय अनुभव घूमता है। हर महत्वाकांक्षा, हृदय-विदारक आघात, विजय और शिकायत इसी छोटे से सर्वनाम से बंधी है। फिर भी, अपनी जुबान पर इसके निरंतर प्रवाह के बावजूद, शायद ही कोई इसके वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करता है। 'मैं' वास्तव में क्या दर्शाता है? इसका उत्तर एक गहन विरोधाभास प्रस्तुत करता है: 'मैं' शब्द मनुष्य के सबसे बड़े भ्रम और उसके परम सत्य—दोनों को व्यक्त कर सकता है। यह कौन सा रूप प्रकट करेगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी दृष्टि किस ओर है—क्या हम बाहर संसार की ओर देख रहे हैं या अपने अस्तित्व के मूल स्रोत की ओर अंतर्मुखी हैं। सामान्य, सांसारिक अर्थ में 'मैं' अहंकार का प्रतीक है। जब हमारी चेतना बाहर की ओर केंद्रित होती है, तब हम 'माया' (भ्रम) के प्रभाव में जीवन जीते हैं। इस स्थिति में 'मैं' क्षणभंगुर और बाहरी उपाधियो...