असीम होने की प्यास
Photo Credit: Instagram असीम होने की प्यास मानव मन की हर चाहत, यदि गहराई से देखी जाए, तो वह सीमाओं से परे जाने की एक पुकार है। हम निरंतर अधिक ज्ञान, गहरा प्रेम, अधिक विस्तार और स्थायी शांति की खोज में रहते हैं। फिर भी इंद्रियों के माध्यम से जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह समय, परिस्थिति और रूप के बंधनों में ही बंधा रहता है। यह बेचैनी मानव स्वभाव का कोई दोष नहीं है; यह आत्मा की असीम होने की सहज प्यास है। यह हमारे भीतर का जीवन ही है जो अपनी ही बनाई सीमाओं को तोड़कर उस अनंत स्रोत में लौट जाना चाहता है जहाँ से वह प्रकट हुआ है। हिमालयन समर्पण ध्यान में इस गहरी प्यास को किसी संघर्ष या प्रयास के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे वास्तविक मुक्ति की ओर ले जाने वाला आंतरिक मार्गदर्शन माना जाता है। पूज्य श्री शिवकृपानंद स्वामीजी के पावन सानिध्य में साधक यह अनुभव करता है कि अपने असीम स्वरूप को जानना बाहरी जगत से कुछ नया पाने में नहीं है। यह भीतर की ओर मुड़ने और पूर्ण, अशर्त समर्पण की पावन कला को जीने से संभव होता है। आध्यात्मिक साधक अक्सर यह मानकर चलता है कि आत्म-साक्षात्कार के लिए अत्यधिक मान...