मानसिक शोर के नीचे
Photo Credit: Pinterest मानसिक शोर के नीचे मन शायद ही कभी मौन होता है। यह निरंतर सक्रिय रहता है—सोचता है, विश्लेषण करता है, अनुमान लगाता है। जब क्रोध, भय, पीड़ा या दुख उठते हैं, तो मन तुरंत किसी कारण को पकड़ लेता है: “यह इस व्यक्ति की वजह से है, इस परिस्थिति की वजह से है।” परंतु अक्सर यह भावना बहुत पुरानी होती है। वर्तमान क्षण केवल उस भाव को छूता है जो वर्षों से भीतर दबा हुआ था। शोर का वास्तविक स्वरूप मानसिक शोर सत्य नहीं है; यह ध्यान भटकाने वाला है। मन की तेज़ व्याख्याएँ धूल के तूफ़ान जैसी हैं, जो गहरी वास्तविकता को ढक देती हैं। वर्तमान कारण अक्सर मूल नहीं होता; वह केवल दबे हुए भाव को जगाता है। गहरी परत शोर के नीचे दबे हुए भावनाओं की ऊर्जा होती है। छाती का कसाव वर्षों का दबा हुआ शोक हो सकता है। पेट की गाँठ बचपन का भय हो सकती है। कंधों का भारीपन लंबे समय से उठाई गई जिम्मेदारियों का बोझ हो सकता है। मन इन्हें समझाने की कोशिश करता है, पर वास्तविक उपचार तभी होता है जब हम विश्लेषण छोड़कर केवल अनुभव करते हैं। विश्लेषण के बिना अभिव्यक्ति की शक्ति अति‑सोच के चक्र को तोड़ने के लि...