देह-भाव की सीमा को पार करना
Photo Credit: Tony Kane MindHealth and Awareness देह-भाव की सीमा को पार करना इस भौतिक संसार में जन्म लेते ही हमारे कंडीशनिंग (संस्कार निर्माण) की एक व्यापक प्रक्रिया शुरू हो जाती है। हम विशुद्ध, निराकार चेतना के रूप में आते हैं, लेकिन तुरंत ही हमारे ऊपर बाहरी पहचान की परतें चढ़ा दी जाती हैं। हमें एक नाम दिया जाता है, एक परिवार से जोड़ा जाता है, धर्म की पहचान दी जाती है, और एक विशेष शहर, राज्य तथा देश की सीमाओं में बांध दिया जाता है। हमें सिखाया जाता है कि क्या 'हमारा' है और क्या 'दूसरों' का, हमारी सीमाएं कहाँ से शुरू होती हैं और कहाँ समाप्त होती हैं। अनजाने में, हम इन बाहरी लेबलों को ही अपना वास्तविक सत्य मान लेते हैं। हम दर्पण में देखते हैं और स्वयं की पहचान पूरी तरह से उस साधन यानी भौतिक शरीर से कर बैठते हैं, और भीतर विराजमान मौन, दिव्य सारथी को भूल जाते हैं। यह गहरी जड़ें जमा चुकी पहचान ही देह-भाव (शरीर चेतना) का मूल कारण है। देह-भाव में जीना हमें एक गहरे भ्रम में फंसा देता है। चूंकि यह भौतिक शरीर नश्वर, क्षणभंगुर और समय के आधीन है, इसलिए इससे बंधा जीवन निरंतर भय, ...