निःकामता ही परम उपलब्धि है
Photo Credit: Pinterest निःकामता ही परम उपलब्धि है मानव मन स्वभाव से चंचल है, जो निरंतर इच्छाओं का पीछा करता रहता है। इच्छा ही अशांति की जड़ है। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं तो निराशा उत्पन्न होती है, और जब पूरी हो जाती हैं तो आसक्ति और अधिक पाने की लालसा जन्म लेती है। दोनों ही स्थितियों में मन अपनी सहजता खो देता है। सच्ची आध्यात्मिक प्रगति तब प्रारंभ होती है जब साधक समझता है कि निःकामता कोई शून्यता नहीं, बल्कि पूर्णता है—परम उपलब्धि। जब इच्छाएँ क्षीण होती हैं तो भय भी मिटने लगता है। भय तो इच्छा की ही छाया है—जो हमारे पास है उसे खोने का भय, या जो चाहिए उसे न पाने का भय। इच्छाओं के क्षीण होने पर उनसे उत्पन्न होने वाले विक्षिप्त विचार भी शांत हो जाते हैं। मन, जो पहले अशांत था, धीरे-धीरे शांत हो जाता है। और उसी शांति में आनंद स्वतः प्रकट होता है। आनंद कोई उपलब्धि नहीं है; वह तो हमारी सहज अवस्था है, जो इच्छाओं और भय की परतों से ढकी रहती है। ‘रोग’ वास्तव में हमारी सहजता के लुप्त होने का ही नाम है। Disease का अर्थ ही है—ease का खो जाना। जब मन अशांत होता है तो शरीर भी असंतुलित हो जाता है...