दूसरों में अच्छाई देखना स्वभाव बन जाता है
Photo Credit: Facebook दूसरों में अच्छाई देखना स्वभाव बन जाता है ध्यान केवल मौन की साधना नहीं है; यह रूपांतरण की साधना है। जब हम नियमित रूप से ध्यान करते हैं—अकेले या सामूहिक रूप से—तो हम सार्वभौमिक चेतना से जुड़ते हैं। यह जुड़ाव केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी है। यह हमारे भीतर की असंगतियों को मिटाता है, मन की अशांति को शांत करता है और हमारी दृष्टि को बदल देता है। सबसे गहरा परिवर्तन यह होता है कि दूसरों में अच्छाई देखना हमारा स्वभाव बन जाता है। सामान्यतः मनुष्य का मन दोषों को देखने का अभ्यस्त होता है। हम देखते हैं कि क्या कमी है, क्या गलत है और क्या अपूर्ण है। यह प्रवृत्ति नकारात्मकता, निर्णय और अलगाव पैदा करती है। लेकिन ध्यान हमारे भीतर का दृष्टिकोण बदल देता है। जैसे ही मन शांत होता है और हृदय खुलता है, हम अलग तरह से देखने लगते हैं। अब हम दोषों पर नहीं, बल्कि अच्छाई पर ध्यान देते हैं। यह परिवर्तन जबरन नहीं होता—यह स्वतः उत्पन्न होता है। जैसे फूल सूर्य और जल से पोषित होकर खिलता है, वैसे ही ध्यान से अच्छाई हमारी दृष्टि में खिलती है। सार्वभौमिक चेतना शुद्ध प्रेम, करुणा औ...