निःकामता ही परम उपलब्धि है
निःकामता ही परम उपलब्धि है
मानव मन स्वभाव से चंचल है, जो निरंतर इच्छाओं का पीछा करता रहता है। इच्छा ही अशांति की जड़ है। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं तो निराशा उत्पन्न होती है, और जब पूरी हो जाती हैं तो आसक्ति और अधिक पाने की लालसा जन्म लेती है। दोनों ही स्थितियों में मन अपनी सहजता खो देता है। सच्ची आध्यात्मिक प्रगति तब प्रारंभ होती है जब साधक समझता है कि निःकामता कोई शून्यता नहीं, बल्कि पूर्णता है—परम उपलब्धि।
जब इच्छाएँ क्षीण होती हैं तो भय भी मिटने लगता है। भय तो इच्छा की ही छाया है—जो हमारे पास है उसे खोने का भय, या जो चाहिए उसे न पाने का भय। इच्छाओं के क्षीण होने पर उनसे उत्पन्न होने वाले विक्षिप्त विचार भी शांत हो जाते हैं। मन, जो पहले अशांत था, धीरे-धीरे शांत हो जाता है। और उसी शांति में आनंद स्वतः प्रकट होता है। आनंद कोई उपलब्धि नहीं है; वह तो हमारी सहज अवस्था है, जो इच्छाओं और भय की परतों से ढकी रहती है।
‘रोग’ वास्तव में हमारी सहजता के लुप्त होने का ही नाम है। Disease का अर्थ ही है—ease का खो जाना। जब मन अशांत होता है तो शरीर भी असंतुलित हो जाता है। अष्टांग योग की संपूर्ण साधना इसी सहजता के लुप्त होने को रोकने के लिए है। अनुशासन, आत्मसंयम और ध्यान के माध्यम से साधक पुनः सहजता की अवस्था में लौटता है।
हिमालय के परम पूज्य गुरु श्री शिवकृपानंद स्वामीजी के सान्निध्य में ध्यान इस प्रक्रिया को तीव्र कर देता है। उनके आभामंडल में साधक के मन और हृदय का शुद्धिकरण होता है। स्वामीजी की उपस्थिति इच्छाओं की अशांत तरंगों को मिटाकर साधक को शांति से भर देती है। उनके मार्गदर्शन में ध्यान केवल अभ्यास नहीं, बल्कि निःकामता का जीवंत अनुभव बन जाता है।
निःकामता का अर्थ उदासीनता या लापरवाही नहीं है। इसका अर्थ है सहजता में जीना, बंधनों से मुक्त होकर। जब साधक निःकाम होता है, तब भी कर्म करता है, पर कर्म सहज प्रवाह से होता है, बिना किसी आंतरिक संघर्ष के। कार्य पूरे होते हैं, दायित्व निभते हैं, पर मन शांत रहता है। यही सहज जीवन का सार है।
पूज्य गुरुमाँ की कृपा इस यात्रा को और पोषित करती है। उनका करुणामय मार्गदर्शन साधकों को अनावश्यक विचारों और व्यर्थ बातों से दूर रहने की शिक्षा देता है। वे बताती हैं कि तुच्छ बातों को अनदेखा करना भी ध्यान का एक रूप है, क्योंकि इससे मन में अनावश्यक विचार उत्पन्न नहीं होते।
जैसे-जैसे साधक ध्यान करता है, शुद्धिकरण गहराता जाता है। मन का कचरा खाली होता है। उस खालीपन में चैतन्य स्वतः प्रवाहित होता है। निःकामता कोई जबरन साधना नहीं है; वह तो तब खिलती है जब भीतर की जगह शुद्ध होकर खाली हो जाती है। साधक तब प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीता है—भूमि माता पर खड़े होकर उसकी पवित्रता को ग्रहण करता है, आकाश की ओर देखकर सूर्यनाड़ी को शुद्ध करता है, और गुरुशक्ति के प्रति समर्पित रहता है।
अंततः निःकामता ही सर्वोच्च उपलब्धि है क्योंकि यह हमें हमारी मूल सहज अवस्था में लौटा देती है। इसका अर्थ जीवन का त्याग नहीं, बल्कि जीवन को बंधनरहित होकर जीना है। निःकामता में साधक स्वतंत्र, निर्भय और आनंदमय होता है। यही सच्चे मोक्ष का अर्थ है।
जय बाबा स्वामी!

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