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ब्रह्म मुहूर्त: आत्मजागृति का अमृतकाल

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  Photo Credit: The Divine India ब्रह्म मुहूर्त: आत्मजागृति का अमृतकाल भोर से पहले की वह पावन घड़ी, जब संसार मौन होता है और तारे धीरे-धीरे ओझल होने लगते हैं—उसे ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। यह सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व का समय होता है, जिसे ध्यान, प्रार्थना और आत्मिक जागृति के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में ब्रह्म मुहूर्त केवल एक समय नहीं, बल्कि एक द्वार है—स्वयं में प्रवेश का द्वार। स्वामी शिवकृपानंदजी बताते हैं कि इस समय का कंपन अत्यंत सूक्ष्म और सात्त्विक होता है। प्रकृति शांत होती है, मन स्वाभाविक रूप से स्थिर होता है, और आत्मा ग्रहणशील होती है। इस समय ध्यान क्यों प्रभावशाली होता है? क्योंकि जब बाहरी संसार शांत होता है, तब भीतरी संसार तक पहुँचना सहज हो जाता है। दिन की व्यस्तता, शोर और डिजिटल उलझनों की शुरुआत नहीं हुई होती। चित्त स्वाभाविक रूप से शांत होता है। इस मौन में गुरु तत्व से जुड़ाव गहरा और सहज हो जाता है। ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान करना केवल अभ्यास नहीं, बल्कि एक संरेखण है—प्रकृति की लय से, ब्रह्मांडीय ऊर्जा से, और अपने आत्मस्वरूप से। समर...

दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं?

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  Photo Credit: Pinterest दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं? दुर्घटनाएँ—चाहे शारीरिक हों, मानसिक हों या परिस्थितिजन्य—अचानक आती हैं और हमें झकझोर देती हैं। वे हमारे नियंत्रण के भ्रम को तोड़ती हैं और जीवन की गहराई से पहचान कराती हैं। प्रश्न उठता है: ये दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं? क्या ये भाग्य हैं, कर्म हैं, संयोग हैं या ईश्वरीय योजना? हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से देखा जाए तो कोई भी घटना वास्तव में आकस्मिक नहीं होती। हर अनुभव आत्मा के लिए एक संदेश लेकर आता है। स्वामी शिवकृपानंदजी सिखाते हैं कि ब्रह्मांड में कुछ भी बिना कारण नहीं होता। हर घटना किसी सूक्ष्म योजना का हिस्सा होती है। मन की दृष्टि से दुर्घटनाएँ अन्यायपूर्ण लग सकती हैं। लेकिन आत्मा की दृष्टि से वे अवसर होती हैं—कभी पीड़ादायक, कभी विनम्रता सिखाने वाली, परंतु सदैव उद्देश्यपूर्ण। वे हमें हमारी सीमाओं से परिचित कराती हैं और अहंकार को पिघलाती हैं। समर्पण ध्यानयोग हमें भीतर की ओर मुड़ना सिखाता है। जब हम ध्यान में बैठते हैं और गुरु तत्व को समर्पित होते हैं, तो घटनाओं के पीछे की सूक्ष्म बुद्धि को अनुभव करने लगते हैं। मन को कार...

छोड़ने के बाद क्या शेष रहता है?

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  Photo Credit: In.pinterest.in छोड़ने के बाद क्या शेष रहता है? अक्सर हम छोड़ने को हानि मानते हैं। हमें डर लगता है कि यदि हम अपने संबंधों, पहचान और अपेक्षाओं को छोड़ देंगे, तो हमारे पास कुछ नहीं बचेगा। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में छोड़ना शून्यता नहीं, बल्कि जागृति है। यह वह पवित्र क्रिया है जिसमें हम असत्य को त्यागते हैं ताकि सत्य प्रकट हो सके। स्वामी शिवकृपानंदजी सिखाते हैं कि अहंकार पकड़ता है। वह भूमिकाओं, वस्तुओं, विचारों और पीड़ा तक से चिपका रहता है। मन डर और इच्छा से संचालित होकर इन सब पर कहानियाँ बनाता है। हम मानने लगते हैं कि हम वही हैं जो हमारे पास है, जो हम करते हैं, या जो लोग हमारे बारे में सोचते हैं। लेकिन ये सब अस्थायी परतें हैं। जब हम समर्पण की भावना से ध्यान करते हैं—पूर्ण आत्मनिवेदन गुरु तत्व को—तो ये परतें धीरे-धीरे हटने लगती हैं। हम मन को ठीक करने या अहंकार से लड़ने की कोशिश नहीं करते। हम बस छोड़ते हैं। मौन में बैठते हैं, चित्त को सहस्रार पर रखते हैं, और गुरु की ऊर्जा को प्रवाहित होने देते हैं। इस प्रवाह में असत्य विलीन होने लगता है। छोड़ना हार नहीं है। य...

दृष्टिकोण, मन और अस्तित्व: समर्पण की दृष्टि से

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  Photo Credit: Pinterest दृष्टिकोण, मन और अस्तित्व: समर्पण की दृष्टि से हमारे जीवन का अनुभव इस पर निर्भर करता है कि हम उसे कैसे देखते हैं। दृष्टिकोण वह लेंस है जिससे मन वास्तविकता को समझता है। और मन वह कैनवास है जिस पर हमारा सम्पूर्ण जीवन चित्रित होता है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में यह त्रिकोण—दृष्टिकोण, मन और अस्तित्व—केवल दर्शन नहीं, बल्कि गहन साधना का विषय है। स्वामी शिवकृपानंदजी सिखाते हैं कि मन शत्रु नहीं, बल्कि एक उपकरण है। लेकिन जब दृष्टिकोण अहंकार, भय या संस्कारों से ढका होता है, तो मन चंचल, प्रतिक्रियाशील और खंडित हो जाता है। हम जीवन को विकृत चश्मे से देखने लगते हैं—माया को सत्य समझते हैं, प्रतिक्रिया को विवेक मान बैठते हैं। अस्तित्व स्वयं में शुद्ध, मौन और पूर्ण है। यह सबका आधार है। लेकिन हमारा दृष्टिकोण हमें इस पूर्णता से अलग कर देता है। हम विभाजन करते हैं, लेबल लगाते हैं, निर्णय करते हैं। हम आत्मा की उपस्थिति में नहीं, बल्कि मन की कल्पनाओं में जीते हैं। समर्पण ध्यानयोग में यात्रा भीतर की ओर होती है। ध्यान मन को नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि गुरु तत्व को समर्पित होन...

अनिश्चित जीवन में आत्मिक स्थिरता

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Photo Credit: Coaching Confidence   अनिश्चित जीवन में आत्मिक स्थिरता अनिश्चितता जीवन का एक अपरिवर्तनीय सत्य है, जिसके बिना जीवन नीरस माना जाएगा। चाहे हम कितनी भी सावधानी से योजना बनाएं, जीवन ऐसे तरीकों से प्रकट होता है जिन्हें हम पूर्वानुमान नहीं कर सकते। परिस्थितियाँ बदलती हैं, संबंधों में उतार-चढ़ाव आता है, स्वास्थ्य में परिवर्तन होता है, और परिणाम अक्सर अपेक्षाओं को चुनौती देते हैं। ऐसे क्षणों में मन नियंत्रण चाहता है—लेकिन सूक्ष्म स्तर पर आत्मा पूर्ण और निरपेक्ष समर्पण की खोज में रहती है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में अनिश्चितता को खतरे के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे गहन जागरूकता के द्वार के रूप में समझा जाता है। स्वामी शिवकृपानंदजी सिखाते हैं कि जब हम भीतर की ओर मुड़ते हैं, तो एक ऐसा केंद्र खोजते हैं जो बाहरी उथल-पुथल से अछूता रहता है। यह केंद्र है—स्वयं: मौन, प्रकाशमयी और स्थिर। ध्यान अनिश्चितता और आंतरिक स्थिरता के बीच एक सेतु बन जाता है। जब हम मौन में बैठते हैं और गुरु ऊर्जा के चरणों में समर्पित होते हैं, तो हम जीवन से भागते नहीं—बल्कि उसके सार में प्रवेश करते हैं। समर...

हर अनुभव एक दृष्टिकोण का प्रतिबिंब है

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  Photo Credit: Vivekvani हर अनुभव एक दृष्टिकोण का प्रतिबिंब है जीवन जैसा घटता है वैसा नहीं, बल्कि जैसा हम उसे देखते हैं वैसा अनुभव होता है। हर अनुभव—सुखद या कठिन—हमारे दृष्टिकोण से आकार लेता है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में यह समझ आत्मिक विकास की नींव है। दृष्टिकोण केवल मानसिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि वह द्वार है जिससे हम जीवन को अनुभव करते हैं। हम मानते हैं कि जो हम देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, वही सत्य है। लेकिन हमारा दृष्टिकोण हमारे संस्कारों, अनुभवों, भावनाओं और मानसिक स्थिति से रंगा होता है। एक ही परिस्थिति दो लोगों को अलग-अलग अनुभव दे सकती है। एक उसे आशीर्वाद मानता है, दूसरा बोझ। फर्क घटना में नहीं, दृष्टिकोण में है। स्वामी शिवकृपानंदजी सिखाते हैं कि दृष्टिकोण हमारे भीतर की स्थिति का प्रतिबिंब है। जब मन अशांत होता है, तो सुंदरता भी अस्त-व्यस्त लगती है। जब आत्मा जागृत होती है, तो कठिनाई भी उद्देश्यपूर्ण लगती है। समर्पण ध्यानयोग में हम सीखते हैं कि दृष्टिकोण स्थायी नहीं होता—जैसे-जैसे चेतना विकसित होती है, दृष्टिकोण भी बदलता है। तो क्या दृष्टिकोण ही वास्तविकता है? किसी हद तक,...

तकनीकी युग में आध्यात्मिकता: समर्पण की राह

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  Photo Credit: Holistic News तकनीकी युग में आध्यात्मिकता: समर्पण की राह हम आज एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ तकनीक ने जीवन को अभूतपूर्व रूप से बदल दिया है। जानकारी तुरंत मिलती है, जुड़ाव वैश्विक है, और कार्यक्षमता के लिए अनगिनत उपकरण उपलब्ध हैं। फिर भी, इस डिजिटल समृद्धि के बीच, कई लोग आत्मिक रूप से असंबद्ध महसूस करते हैं। प्रश्न उठता है: क्या तकनीक हमारी आध्यात्मिक यात्रा में सहायक है या बाधक? हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि में आध्यात्मिकता संसार को त्यागने की नहीं, बल्कि उसे पार करने की प्रक्रिया है। तकनीक स्वयं में न तो शुभ है, न अशुभ—यह एक साधन है। इसका प्रभाव इस पर निर्भर करता है कि हम इसका उपयोग कैसे करते हैं। यदि सजगता से उपयोग करें, तो यह आत्मिक विकास में सहायक हो सकती है। यदि अनजाने में उपयोग करें, तो यह हमें भीतर से दूर कर सकती है। ध्यान ऐप्स, ऑडियो गाइड्स, ऑनलाइन सत्संग और डिजिटल रिमाइंडर्स ध्यान की दिनचर्या बनाने में सहायक हो सकते हैं। ये साधकों को मौन और समर्पण की ओर ले जा सकते हैं। प्रारंभिक चरण में ये उपकरण उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन स्वामी शिवकृपानंदजी सिखाते ...