हर अनुभव एक दृष्टिकोण का प्रतिबिंब है
हर अनुभव एक दृष्टिकोण का प्रतिबिंब है
जीवन जैसा घटता है वैसा नहीं, बल्कि जैसा हम उसे देखते हैं वैसा अनुभव होता है। हर अनुभव—सुखद या कठिन—हमारे दृष्टिकोण से आकार लेता है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में यह समझ आत्मिक विकास की नींव है। दृष्टिकोण केवल मानसिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि वह द्वार है जिससे हम जीवन को अनुभव करते हैं।
हम मानते हैं कि जो हम देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, वही सत्य है। लेकिन हमारा दृष्टिकोण हमारे संस्कारों, अनुभवों, भावनाओं और मानसिक स्थिति से रंगा होता है। एक ही परिस्थिति दो लोगों को अलग-अलग अनुभव दे सकती है। एक उसे आशीर्वाद मानता है, दूसरा बोझ। फर्क घटना में नहीं, दृष्टिकोण में है।
स्वामी शिवकृपानंदजी सिखाते हैं कि दृष्टिकोण हमारे भीतर की स्थिति का प्रतिबिंब है। जब मन अशांत होता है, तो सुंदरता भी अस्त-व्यस्त लगती है। जब आत्मा जागृत होती है, तो कठिनाई भी उद्देश्यपूर्ण लगती है। समर्पण ध्यानयोग में हम सीखते हैं कि दृष्टिकोण स्थायी नहीं होता—जैसे-जैसे चेतना विकसित होती है, दृष्टिकोण भी बदलता है।
तो क्या दृष्टिकोण ही वास्तविकता है?
किसी हद तक, हाँ। हमारा दृष्टिकोण ही हमारी जीती-जागती वास्तविकता बन जाता है। यदि हम जीवन को संघर्ष मानते हैं, तो तनाव अनुभव करते हैं। यदि हम इसे सीखने की यात्रा मानते हैं, तो विकास अनुभव करते हैं। बाहरी संसार वही रहता है, लेकिन हमारा आंतरिक संसार अर्थ को बदल देता है।
ध्यान इसलिए शक्तिशाली है। समर्पण ध्यानयोग में जब हम मौन में बैठते हैं और गुरुतत्व को समर्पित होते हैं, तो हमारा दृष्टिकोण शुद्ध होने लगता है। मन शांत होता है, हृदय खुलता है, और आत्मा प्रकाशित होती है। हम जीवन को अहंकार की दृष्टि से नहीं, जागरूकता की दृष्टि से देखने लगते हैं।
दृष्टिकोण सूक्ष्म रूप से प्रकट होता है। एक विलंब असुविधा लग सकता है या दिव्य समय। एक विवाद खतरा लग सकता है या आत्म-विकास का अवसर। जैसे ही दृष्टिकोण बदलता है, अनुभव की ऊर्जा भी बदल जाती है। यह इनकार नहीं, बल्कि रूपांतरण है।
स्वामीजी कहते हैं कि संसार एक दर्पण है। जो हम भीतर रखते हैं, वही बाहर दिखता है। यदि हम भय रखते हैं, तो खतरा दिखता है। यदि हम प्रेम रखते हैं, तो जुड़ाव दिखता है। समर्पण की साधना हमें भीतर का दर्पण शुद्ध करने में मदद करती है, जिससे दृष्टिकोण सत्य से जुड़ता है।
दृष्टिकोण की जागरूकता का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें बिना निर्णय के देखना है। हम अपनी प्रतिक्रियाओं को देखते हैं, अपने मान्यताओं को प्रश्न करते हैं, और आत्मा से उत्तर देना सीखते हैं। यही आध्यात्मिक परिपक्वता है।
समय के साथ, जैसे-जैसे ध्यान गहराता है, दृष्टिकोण व्यापक होता जाता है। हम साधारण में दिव्यता देखने लगते हैं, सामान्य में पवित्रता। जीवन नियंत्रण से नहीं, समर्पण से जीने लगता है।
अंततः, हर अनुभव एक निमंत्रण है—भीतर देखने का, दृष्टिकोण को परिष्कृत करने का, और गहरे सत्य को जागृत करने का। समर्पण ध्यानयोग में यह यात्रा गुरु तत्व की कृपा से संचालित होती है। जैसे-जैसे दृष्टिकोण बदलता है, वैसे-वैसे हमारी वास्तविकता भी बदलती है।
तो रुकिए। विचार कीजिए। ध्यान कीजिए। और स्वयं से पूछिए—“यह क्या हो रहा है?” नहीं, बल्कि “मैं इसे कैसे देख रहा हूँ?” उत्तर ही मार्ग दिखाएगा।

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