दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं?
दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं?
दुर्घटनाएँ—चाहे शारीरिक हों, मानसिक हों या परिस्थितिजन्य—अचानक आती हैं और हमें झकझोर देती हैं। वे हमारे नियंत्रण के भ्रम को तोड़ती हैं और जीवन की गहराई से पहचान कराती हैं। प्रश्न उठता है: ये दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं? क्या ये भाग्य हैं, कर्म हैं, संयोग हैं या ईश्वरीय योजना?
हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से देखा जाए तो कोई भी घटना वास्तव में आकस्मिक नहीं होती। हर अनुभव आत्मा के लिए एक संदेश लेकर आता है। स्वामी शिवकृपानंदजी सिखाते हैं कि ब्रह्मांड में कुछ भी बिना कारण नहीं होता। हर घटना किसी सूक्ष्म योजना का हिस्सा होती है।
मन की दृष्टि से दुर्घटनाएँ अन्यायपूर्ण लग सकती हैं। लेकिन आत्मा की दृष्टि से वे अवसर होती हैं—कभी पीड़ादायक, कभी विनम्रता सिखाने वाली, परंतु सदैव उद्देश्यपूर्ण। वे हमें हमारी सीमाओं से परिचित कराती हैं और अहंकार को पिघलाती हैं।
समर्पण ध्यानयोग हमें भीतर की ओर मुड़ना सिखाता है। जब हम ध्यान में बैठते हैं और गुरु तत्व को समर्पित होते हैं, तो घटनाओं के पीछे की सूक्ष्म बुद्धि को अनुभव करने लगते हैं। मन को कारण समझ में न आए, पर आत्मा जानने लगती है कि यह क्यों घटा।
जब हमारा चित्त बिखरा हुआ, अशांत या नकारात्मकता से भरा होता है, तब हम असंतुलन की ओर बढ़ते हैं। यह दोष नहीं, बल्कि सजगता का निमंत्रण है। समर्पण ध्यानयोग में हम चित्त को सकारात्मक रूप से उपयोग करना सीखते हैं। नियमित ध्यान से चित्त शुद्ध और स्थिर होता है, और गुरु तत्व से जुड़ता है। यह आंतरिक संतुलन हमें स्पष्टता और कृपा प्रदान करता है।
कभी-कभी दुर्घटनाएँ हमारे कर्मों का फल होती हैं। लेकिन जब हम गुरु तत्व से जुड़े होते हैं, तो स्वामीजी कहते हैं कि कर्म के फल की तीव्रता कम हो जाती है। जो तूफ़ान हो सकता था, वह केवल एक हल्की फुहार बन जाता है।
दुर्घटनाएँ हमें जगा सकती हैं। वे हमें वर्तमान में लाती हैं, जीवन की नश्वरता का बोध कराती हैं और सजगता का महत्व समझाती हैं। यदि हम चाहें, तो ये घटनाएँ आत्मिक जागृति के द्वार बन सकती हैं।
प्रश्न यह नहीं कि दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं, बल्कि यह कि हम उन्हें कैसे देखते हैं। क्या हम डर और प्रतिक्रिया से भर जाते हैं, या आत्मा से उत्तर देते हैं?
ध्यान के मौन में हमें सभी उत्तर नहीं मिलते—पर शांति अवश्य मिलती है। स्वीकृति की शक्ति, कर्म को समझने की दृष्टि और आगे बढ़ने की कृपा मिलती है।
तो जब जीवन में कोई अनहोनी घटे, तो रुकिए। साँस लीजिए। भीतर मुड़िए। समर्पण कीजिए। और पूछिए—“जीवन मुझे क्या सिखाना चाहता है?”
समर्पण के मार्ग में, हर दुर्घटना भी मुक्ति की ओर एक कदम बन सकती है—यदि हम उसे उस दृष्टि से देखें।

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