ब्रह्म मुहूर्त: आत्मजागृति का अमृतकाल
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| Photo Credit: The Divine India |
ब्रह्म मुहूर्त: आत्मजागृति का अमृतकाल
भोर से पहले की वह पावन घड़ी, जब संसार मौन होता है और तारे धीरे-धीरे ओझल होने लगते हैं—उसे ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। यह सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व का समय होता है, जिसे ध्यान, प्रार्थना और आत्मिक जागृति के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में ब्रह्म मुहूर्त केवल एक समय नहीं, बल्कि एक द्वार है—स्वयं में प्रवेश का द्वार। स्वामी शिवकृपानंदजी बताते हैं कि इस समय का कंपन अत्यंत सूक्ष्म और सात्त्विक होता है। प्रकृति शांत होती है, मन स्वाभाविक रूप से स्थिर होता है, और आत्मा ग्रहणशील होती है।
इस समय ध्यान क्यों प्रभावशाली होता है?
क्योंकि जब बाहरी संसार शांत होता है, तब भीतरी संसार तक पहुँचना सहज हो जाता है। दिन की व्यस्तता, शोर और डिजिटल उलझनों की शुरुआत नहीं हुई होती। चित्त स्वाभाविक रूप से शांत होता है। इस मौन में गुरु तत्व से जुड़ाव गहरा और सहज हो जाता है।
ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान करना केवल अभ्यास नहीं, बल्कि एक संरेखण है—प्रकृति की लय से, ब्रह्मांडीय ऊर्जा से, और अपने आत्मस्वरूप से। समर्पण ध्यानयोग में यह संरेखण किसी प्रयास से नहीं, बल्कि समर्पण से होता है। हम चित्त को सहस्रार पर रखते हैं और गुरु की ऊर्जा को प्रवाहित होने देते हैं।
स्वामीजी कहते हैं कि यह समय वह है जब ईश्वरीय डाकिया ब्रह्मांड के संदेश लाता है। लेकिन उन्हें पाने के लिए हमें जागरूक होना चाहिए—केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि आत्मिक रूप से भी। यह वह समय है जब दृश्य और अदृश्य के बीच की परत सबसे पतली होती है। अंतर्दृष्टि जागती है, अंतःकरण स्पष्ट होता है, और आत्मा अपने स्वरूप को स्मरण करती है।
यह समय सामूहिक चेतना का भी होता है। जब हजारों साधक एक साथ मौन में बैठते हैं, तो एक शक्तिशाली ऊर्जा क्षेत्र बनता है। समर्पण ध्यानयोग में यह सामूहिक ऊर्जा व्यक्तिगत साधना को और गहरा कर देती है।
ब्रह्म मुहूर्त में साधना करना अनुशासन और भक्ति को जीवन में लाता है। जल्दी उठना आसान नहीं होता—यह संकल्प, प्रयास और कृपा माँगता है। लेकिन धीरे-धीरे यह एक पवित्र आदत बन जाती है। शरीर सहयोग करता है, मन शांत होता है, और आत्मा आनंदित होती है।
ब्रह्म मुहूर्त हमें याद दिलाता है कि संसार जागे उससे पहले हमें भीतर जागना है। दिन की शुरुआत से पहले आत्मा से जुड़ना है। यही जुड़ाव पूरे दिन को सजगता, शांति और समर्पण से भर देता है।
तो कल सुबह, सूरज के उगने से पहले, मौन में बैठिए। संसार को सोने दीजिए। आत्मा को जागने दीजिए। और उस पावन मौन में गुरु तत्व की उपस्थिति को अनुभव कीजिए।

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