परिवर्तन का विरोध करना जीवन का विरोध करना है

 

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परिवर्तन का विरोध करना जीवन का विरोध करना है

मनुष्य स्थिरता चाहता है। हमें लगता है कि रिश्ते, पहचान, करियर और शरीर हमेशा वैसे ही रहेंगे। परंतु जीवन का नियम स्थायित्व नहीं, परिवर्तन है। परिवर्तन का विरोध करना समुद्र को रोकने या नदी को थामने जैसा है। सुरक्षा स्थिरता में नहीं, बल्कि प्रवाह के साथ तैरना सीखने में है।

स्थायित्व का भ्रम
हम अक्सर इस भ्रम में जीते हैं कि सब कुछ वैसा ही रहेगा। परंतु जीवन गति है। ठहराव जीवन का इंकार है।

पीढ़ियों का अंतर
युवा परिवर्तन को उत्साह से अपनाते हैं—नए अनुभव, विकास, भविष्य। उम्र बढ़ने पर हम परिवर्तन से डरने लगते हैं। सच्ची आध्यात्मिक परिपक्वता का अर्थ है उस युवा openness को बनाए रखना, ताकि आराम ठहराव में न बदल जाए।

पीड़ा बनाम दुःख
परिवर्तन स्वयं दुःख नहीं देता। पीड़ा स्वाभाविक है—हानि, अंत, संक्रमण। पर दुःख प्रतिरोध से पैदा होता है। जब हम पुराने स्वरूपों या रिश्तों से चिपकते हैं, तो भीतर घर्षण होता है। पीड़ा संकेत है; प्रतिरोध उसे दुःख बना देता है।

क्षणभंगुरता में जीवन
यदि चीजें कभी न बदलतीं, तो जीवन स्थिर तस्वीर होता, चलचित्र नहीं। फूल इसलिए मूल्यवान है क्योंकि वह खिलता और मुरझाता है। ऋतु इसलिए प्रिय है क्योंकि वह बदलती है। जीवन को स्वीकारना मतलब शुरुआत और अंत दोनों को स्वीकारना है।

प्रवाह का अभ्यास
जहाँ आप बहुत कसकर पकड़ रहे हैं—नौकरी, अपेक्षा, पहचान—उसे देखें। नियंत्रण से विश्वास की ओर बढ़ें। विश्वास रखें कि ब्रह्मांड की बुद्धि आपको मार्गदर्शन करेगी। इस सप्ताह एक अप्रत्याशित परिवर्तन को “हाँ” कहें, “ना” नहीं।

ध्यान और समर्पण
साक्षात् गुरु श्री शिवकृपानंद स्वामीजी के मार्गदर्शन में ध्यान हमें बिना शर्त समर्पण सिखाता है। ध्यान में प्रतिरोध मिटता है और स्वीकृति सहजता से आती है। परिवर्तन शत्रु नहीं, बल्कि शिक्षक बन जाता है।

निष्कर्ष
परिवर्तन का विरोध जीवन का विरोध है। परिवर्तन को अपनाना अस्तित्व को अपनाना है। जब हम पकड़ छोड़ते हैं और विश्वास करते हैं, तो जीवन युद्ध नहीं, नृत्य बन जाता है। परिवर्तन हमें नष्ट करने नहीं, बल्कि रूपांतरित करने आता है।

जय बाबा स्वामी!

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