आप अपना अतीत बदल सकते हैं
आप अपना अतीत बदल सकते हैं
मानव अस्तित्व अक्सर एक अदृश्य, अटूट बेड़ी में बंधा हुआ प्रतीत होता है: हमारे अतीत का बोझ। हम पछतावे से भरे संस्मरणों, कभी न भरने वाले पुराने घावों और अपने कर्मों के उस अनसुलझे प्रभाव को ढोते रहते हैं जो हमारे वर्तमान में निरंतर गूंजता रहता है। हममें से अधिकतर लोग यही मानते हैं कि अतीत पत्थर की लकीर है—स्थिर, अपरिवर्तनीय और हमेशा के लिए यह तय करने वाला कि हम कौन हैं।
फिर भी, आध्यात्मिक ज्ञान एक गहरा सत्य उजागर करता है: समय सीधा या रैखिक (linear) नहीं है।
चेतना के उच्च स्तरों पर समय कल से आने वाले कल की ओर सीधी रेखा में नहीं चलता। यह स्पंदन, अनुनाद और ऊर्जा का एक अनंत विस्तार है। जिसे हम "अतीत" मानते हैं, वह वास्तव में किसी अभेद्य दीवार के पीछे छिपा कोई दूर का युग नहीं है; वह यहीं और अभी हमारे सूक्ष्म ऊर्जा शरीरों में अनसुलझे संस्कारों, मानसिक धारणाओं और भावनात्मक प्रभावों के रूप में जीवित है। चूँकि आपका अतीत आपकी वर्तमान चेतना में एक सक्रिय ऊर्जावान छाप के रूप में मौजूद है, इसलिए जैसे ही आप उस आंतरिक ऊर्जा को रूपांतरित करते हैं, आप उसकी वास्तविकता को पूरी तरह बदल देते हैं।
आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु प.पू. श्री शिवकृपानंद स्वामीजी द्वारा प्रदत्त हिमालयन समर्पण ध्यान के माध्यम से यह रूपांतरण केवल एक अमूर्त दर्शन न रहकर एक सजीव, सुलभ अनुभव बन जाता है।
समर्पण के केंद्र में है—पूर्ण समर्पण। हम अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा अपने अतीत की गलतियों का विश्लेषण करने, उन्हें तार्किक रूप देने या मानसिक रूप से सुधारने में बिता देते हैं, जिससे हम केवल अपराधबोध और कर्म-बंधनों में और अधिक उलझ जाते हैं। जब कोई साधक स्वामीजी की करुणामयी छत्रछाया में आता है, तो एक दिव्य प्रक्रिया आरंभ होती है। स्वामीजी हमें सिखाते हैं कि हम अपना सब कुछ—अपने पछतावे, अपना दर्द, अपनी असफलताएं और अपना संपूर्ण अतीत—सद्गुरु के श्रीचरणों में अर्पित कर दें।
जब हम पूर्ण विनम्रता से समर्पण करते हैं, तो गुरु अपनी असीम कृपा से इस वर्तमान जन्म के भारी, कष्टकारी बुरे कर्मों को स्वयं में समाहित कर लेते हैं। जिसे हमारी छोटी सी मानवीय बुद्धि केवल तर्कों से कभी समाप्त नहीं कर सकती थी, उसे आत्म-साक्षात्कारी गुरु अपने दिव्य आभामंडल की अग्नि में भस्म कर देते हैं। हम उस भारी बोझ से मुक्त हो जाते हैं जिसे अकेले ढोने के लिए हम कभी बने ही नहीं थे।
तो फिर, हमारे संचित प्रारब्ध—अर्थात पूर्व जन्मों के कर्मों के संचय—का क्या होता है?
समर्पण ध्यान का नियमित, मौन अभ्यास साधक को सहस्त्रार चक्र पर सीधे विशुद्ध वैश्विक चेतना से जोड़ता है। जैसे-जैसे दिन-प्रतिदिन दिव्य चैतन्य भीतर प्रवाहित होता है, मन शांत हो जाता है और आंतरिक मौन का विस्तार होता है। ध्यान जादू की तरह समस्याओं को तुरंत गायब नहीं कर देता; बल्कि, यह आपके भीतर छिपी असीम आत्मिक शक्ति और दृढ़ता को जागृत करता है। आप उस धैर्य, समभाव और स्पष्टता से भर जाते हैं जिसकी आवश्यकता पूर्व जन्मों के संस्कारों का सामना करने के लिए होती है। जो कभी विनाशकारी समुद्री लहर जैसा महसूस होता था, वह अब केवल एक शांत लहर बनकर आपके चरणों को छूकर लौट जाता है, और आपकी आंतरिक शांति पूरी तरह अडिग रहती है।
आपके सूक्ष्म तंत्र में आने वाला यह गहरा बदलाव आपकी ऊर्जा और आपके दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल देता है। जब किसी पुरानी घटना से जुड़ी भावनात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है, तो वह स्मृति आपको चोट पहुँचाने या सीमित करने की शक्ति खो देती है। वह घटना वस्तुनिष्ठ इतिहास में घटित हुई हो सकती है, किंतु आपकी आत्मा पर उसका भावनात्मक और कर्मिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
अतीत के भावनात्मक भार को मुक्त करके, आप अपने वर्तमान में उन अनुभवों के स्पंदन को पुनर्जीवित होने से रोकते हैं। आप भय, आक्रोश और संशय के दोहराए जाने वाले अचेतन चक्रों को तोड़ देते हैं। और चूँकि भविष्य निरंतर वर्तमान क्षण के स्पंदन से ही जन्म लेता है, इसलिए आपकी आंतरिक स्थिति में आने वाला बदलाव स्वाभाविक रूप से आपके पूरे जीवन की दिशा बदल देता है। आप शांति, सार्थकता और आध्यात्मिक स्वतंत्रता से भरी एक नई जीवन-यात्रा में प्रवेश करते हैं।
अपने सारे बोझ गुरु को सौंप दें, समर्पण की शांत निश्चलता में बैठें, और अनुभव करें कि आप अपने अतीत के बंदी नहीं, बल्कि अपनी चेतना के स्वामी हैं।

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