वास्तविकता का स्वरूप
वास्तविकता का स्वरूप
हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जो हमें बाहरी रूप से आकर्षित करता है। जन्म के क्षण से ही शिशु को परिवार द्वारा एक नाम दिया जाता है। यह नाम, जो देखने में साधारण लगता है, पहचान का बीज बन जाता है। यही पहला आवरण है जो आत्मा की शुद्ध चेतना को ढक देता है। नाम से अहंकार उत्पन्न होता है—“मैं अमुक हूँ, इस परिवार का हूँ, इस नगर का हूँ।” जैसे‑जैसे बच्चा बड़ा होता है, शिक्षा, नौकरी, वेतन, संपत्ति और उपलब्धियों की परतें जुड़ती जाती हैं। हर परत अहंकार को मजबूत करती है और माया का जाल गहरा होता जाता है।
अहंकार तुलना और अलगाव पर आधारित होता है। यह कहता है, “मैं तुमसे अलग हूँ, मैं बेहतर हूँ।” यही अलगाव दुख का मूल है। मन इन भ्रांतियों को लगातार बढ़ाता है। सफलता अहंकार को फुलाती है, असफलता उसे चोट पहुँचाती है, प्रशंसा उसे पोषण देती है और आलोचना उसे हिला देती है। हर स्थिति में मन हमें यह विश्वास दिलाता है कि हम बाहरी परिस्थितियों से परिभाषित होते हैं।
परंतु वास्तविकता इन बदलती पहचानों में नहीं है। वास्तविकता नाम, संपत्ति या उपलब्धियों में नहीं है। वास्तविकता भीतर का मौन साक्षी है—वह चेतना जो सब अनुभवों को देखती है पर उनसे अछूती रहती है।
माया ब्रह्मांड का महान खेल है। यह रूपों, नामों और अनुभवों का नृत्य है। यह बुरा नहीं है, पर धोखा देता है। यह हमें विश्वास दिलाता है कि अस्थायी ही स्थायी है। हम छायाओं का पीछा करते हैं और उन्हें वास्तविक मान लेते हैं।
मन स्वभाव से चंचल है। यह कहानियाँ, निर्णय और आसक्तियाँ बनाता है। यह कहता है, “यह मेरा है, वह तुम्हारा है।” इसी कारण यह हमें भ्रम में बाँधता है। जब मन शांत होता है, वास्तविकता स्वयं प्रकट होती है। मौन में हम अनुभव करते हैं कि हम न तो अहंकार हैं, न नाम, न संपत्ति। हम शुद्ध चेतना हैं।
ध्यान इस भ्रम से मुक्ति का मार्ग है। ध्यान अशांति को मिटाकर भीतर के साक्षी को प्रकट करता है। श्री शिवकृपानंद स्वामी जैसे realised गुरु के मार्गदर्शन में ध्यान सहज हो जाता है। उनका हिमालयन समर्पण ध्यान पूर्ण समर्पण सिखाता है। समर्पण में अहंकार ढीला पड़ता है और मन शांत होता है।
वास्तविकता सरल है। यह संसार का जटिल नाटक नहीं है। यह भीतर की मौन उपस्थिति है। जब हम साक्षी बनकर जीते हैं, हम संसार में भाग लेते हैं पर स्वतंत्र रहते हैं। हम परिवार से प्रेम करते हैं, कार्य करते हैं, जीवन का आनंद लेते हैं—पर उलझते नहीं। यही संबद्ध वैराग्य है।
वास्तविकता नाम, पहचान और संपत्ति का भ्रम नहीं है। यह शुद्ध चेतना है जो सब अनुभवों को देखती है पर उनसे अछूती रहती है। ध्यान और गुरु की कृपा से हम अनुभव करते हैं कि वास्तविकता सरल, मौन और शाश्वत है।
जय बाबा स्वामी!

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