निर्भरता से मुक्ति

 

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निर्भरता से मुक्ति 

निर्भरता से मुक्ति सबसे गहन स्वतंत्रता है। वर्तमान में जीने का अर्थ है स्वयं में इतना स्थिर होना कि किसी की उपस्थिति या अनुपस्थिति हमारी शांति को प्रभावित करे। यह उदासीनता नहीं है, बल्कि सच्ची स्वतंत्रता है।

जन्म से ही हम दूसरों पर निर्भर होते हैंपरिवार पर प्रेम के लिए, मित्रों पर संगति के लिए, समाज पर पहचान के लिए। जब हमारी शांति इन पर निर्भर हो जाती है, तो दुख उत्पन्न होता है। प्रशंसा हमें प्रसन्न करती है, आलोचना हमें चोट पहुँचाती है। यही निर्भरता है।

निर्भरता से मुक्ति का अर्थ जीवन से भागना नहीं है। यह जीवन में पूर्ण भागीदारी है, पर केंद्रित रहकर। हम परिवार और मित्रों से जुड़े रहते हैं, पर हमारी शांति उन पर निर्भर नहीं होती। हम प्रेम करते हैं, पर अधिकार नहीं जताते। हम देखभाल करते हैं, पर आसक्ति नहीं रखते।

ध्यान इस स्वतंत्रता का मार्ग है। ध्यान में बैठकर हम साक्षी को अनुभव करते हैं। विचार आते हैं, भावनाएँ उठती हैं, पर साक्षी अछूता रहता है। समय के साथ हम अनुभव करते हैं कि मन की कोई भी बात वास्तविक आत्मा से जुड़ी नहीं है।

श्री शिवकृपानंद स्वामी का हिमालयन समर्पण ध्यान पूर्ण समर्पण सिखाता है। समर्पण में अहंकार ढीला पड़ता है और शून्यता प्रकट होती है। इस शून्यता में स्वतंत्रता उत्पन्न होती है। हम अनुभव करते हैं कि हमारी शांति किसी पर निर्भर नहीं है।

निर्भरता से मुक्ति प्रेम को शुद्ध करती है। यह प्रेम बिना अपेक्षा के देता है, बिना अधिकार के देखभाल करता है और बिना पुरस्कार की चाह के सेवा करता है। यही आत्मा का प्रेम है।

अंततः निर्भरता से मुक्ति वर्तमान में जीना है। यह वास्तविकता को सरल, मौन और शाश्वत रूप में अनुभव करना है। ध्यान और गुरु की कृपा से हम इस स्वतंत्रता को पाते हैं और आनंद तथा निःस्वार्थ प्रेम से प्रकाशित रहते हैं।

जय बाबा स्वामी!


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