शरीर के दर्द से आत्म-जागृति तक
शरीर के दर्द से आत्म-जागृति तक
शारीरिक पीड़ा को अक्सर एक बाधा माना जाता है, लेकिन योग मार्ग पर यह शरीर और आंतरिक चेतना के बीच का पहला संवाद है। जब महर्षि पतंजलि ने 'अष्टांग योग' का विधान रचा, तो उसका क्रम अत्यंत सुविचारित था: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इस व्यवस्था में आसन केवल एक शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि सातवें और आठवें चरण—ध्यान और समाधि—की असीम ऊर्जा को संभालने के लिए तैयार की जाने वाली सुदृढ़ नींव है।
पतंजलि ने आसन को परिभाषित करते हुए कहा है: स्थिरसुखमासनम्—अर्थात जो स्थिर और सुखदायक हो। ऐसी स्थिरता प्राप्त करने के लिए शरीर को अकड़न, तनाव और पीड़ा की परतों से गुजरना पड़ता है। जब कोई साधक अभ्यास शुरू करता है, तो रीढ़ विरोध करती है, जोड़ों में दर्द होता है और भीतर दबी शारीरिक व भावनात्मक स्मृतियाँ (ग्रंथियाँ) उभरती हैं। यह शारीरिक श्रम असल में एक आध्यात्मिक साधना है। योगासन रीढ़ को सीधा करते हैं, प्राण नाड़ियों को खोलते हैं और लंबे समय तक बिना हिले-डुले बैठने की शारीरिक क्षमता प्रदान करते हैं।
इस तैयारी के बिना अशांत शरीर मन को बार-बार भौतिक चेतना की ओर खींचता रहता है। घुटनों या पीठ का खिंचाव ध्यान को खंडित कर देता है। जब साधक सजगता से इस दर्द से गुजरता है, तो शारीरिक बेचैनी समाप्त होने लगती है। प्राणायाम के माध्यम से श्वास स्थिर होती है और शरीर चट्टान की तरह अचल बैठना सीख जाता है। इसी मौन और स्थिरता में इंद्रियाँ अंतर्मुखी (प्रत्याहार) होती हैं और एकाग्रता (धारणा) फलित होती है।
जब शरीर पूरी तरह निष्कंप होता है, तभी सूक्ष्म ऊर्जा का प्रवाह बिना किसी बाधा के संभव हो पाता है। सुप्त आध्यात्मिक शक्ति, कुंडलिनी, मूलाधार चक्र से उठकर सहस्त्रार चक्र की ओर बढ़ने लगती है। यदि शरीर दुर्बल या तनावग्रस्त हो, तो ऊर्जा का यह तीव्र प्रवाह अशांति उत्पन्न कर सकता है। एक अनुशासित और संतुलित शरीर एक सुदृढ़ माध्यम बनकर ऊर्जा को सुषुम्ना नाड़ी में सहजता से ऊपर चढ़ने देता है।
जब यह बाह्य अनुशासन परिपक्व हो जाता है, तब साधक प्रयास से समर्पण की ओर बढ़ता है। यह सहज अवस्था पूज्य श्री शिवकृपानंद स्वामीजी के पावन सानिध्य में समर्पण ध्यान के माध्यम से प्राप्त होती है। समर्पण वहाँ प्रारंभ होता है जहाँ सारे कृत्रिम प्रयास समाप्त होते हैं; यह सिखाता है कि ध्यान कुछ करने का नाम नहीं, बल्कि ठहर जाने की स्थिति है।
स्वामीजी के मार्गदर्शन में साधक अपने विचारों, चिंताओं और देह-भाव को पूरी तरह समर्पित करना सीखता है। शरीर के दर्द या मन के उतार-चढ़ाव से संघर्ष करने के बजाय साधक सद्गुरु के माध्यम से प्रवाहित दिव्य चेतना से जुड़ जाता है। निरंतर विश्लेषण से मुक्त होकर मन स्वतः शांत हो जाता है।
जैसे ही मानसिक हलचल विलीन होती है, शारीरिक तनाव भी एक गहरे आंतरिक मौन में बदल जाता है। साधक स्वयं को पीड़ा, शरीर या विचारों से अलग अनुभव करता हुआ सहस्रार में साक्षी भाव में स्थापित हो जाता है। इस शुद्ध चेतना में ध्यान सहज ही समाधि में बदल जाता है—परमात्मा में पूर्ण लीनता, जहाँ देह शांत होती है और आत्मा अपने वास्तविक, दिव्य स्वरूप में स्थित हो जाती है।

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