सद्गुरु सदैव आपके साथ हैं
सद्गुरु सदैव आपके साथ हैं
हम अक्सर अपने भीतर एक अनकहा, भारी अकेलापन लिए जीते हैं, यह मानकर कि अपनी महत्वाकांक्षाओं, दुखों और सांसारिक संघर्षों का बोझ हमें अकेले ही उठाना है। किंतु, आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु श्री शिवकृपानंद स्वामी (स्वामीजी) के सान्निध्य में हिमालयन समर्पण ध्यान के मार्ग पर एक असाधारण सत्य प्रकट होता है: हम कभी अकेले नहीं हैं। जीवित सद्गुरु केवल भौतिक समीपता, पुस्तकों या सुदूर आश्रमों में ही सीमित नहीं रहते; वे एक समर्पित शिष्य की हर सांस में रचे-बसे एक शाश्वत, जीवंत अस्तित्व हैं।
जब आप प्रतिदिन प्रातः हिमालयन समर्पण ध्यान में बैठते हैं और मन के बौद्धिक कोलाहल को परे रख देते हैं, तब भीतर एक सूक्ष्म परिवर्तन घटित होने लगता है। विचारों, चिंताओं और अहंकार के सहज समर्पण से सुप्त आंतरिक ऊर्जा जागृत होती है और ध्यान स्वतः सहस्रार चक्र की ओर उठने लगता है। नियमित और निरंतर अभ्यास से सीमित 'अहं' की सीमाएं विलीन होने लगती हैं और आप सार्वभौमिक चेतना के असीम सागर में एकाकार होने लगते हैं।
सहस्रार चक्र पर ही यह पावन संबंध अत्यंत प्रत्यक्ष रूप से अनुभव में आता है। वहां सिर के ठीक ऊपर दिव्य चैतन्य की शीतल, कोमल छतरी के रूप में गुरुदेव की प्रेमपूर्ण ऊर्जा स्पंदित महसूस होती है। किसी भी तनावपूर्ण क्षण, तीव्र उथल-पुथल या मानसिक अशांति में अब घबराने या बाहर उत्तर खोजने की आवश्यकता नहीं रहती। बस एक शांत क्षण के लिए आंखें मूंदकर भीतर ध्यान ले जाना होता है। अनायास ही, खाली कमरे में चंदन की एक अलौकिक सुगंध वातावरण में महक उठती है। यह सुगंध धड़कते दिल को तुरंत शांति से भर देती है—मानो मौन में ब्रह्मांड का यह स्पष्ट संदेश हो: स्वामीजी यहीं हैं, आप सुरक्षित हैं।
वह चंदन की सुगंध कोई सामान्य इंद्रिय अनुभूति नहीं, बल्कि विशुद्ध कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण है। किंतु, इस दिव्य उपस्थिति का अनवरत अनुभव पूरी तरह हमारे आंतरिक समर्पण की गहराई पर निर्भर करता है। हमारा समर्पण कितना सच्चा और निष्कपट है? हमने अपने अंतःकरण को कितना निर्मल रखा है? जब हमारा समर्पण पूर्ण होता है, तो स्वामीजी के स्पंदन और दिव्य सुगंध कभी-कभार होने वाले अनुभव नहीं रहते; वे जीवन के हर तनाव, घरेलू दायित्व और व्यक्तिगत परीक्षा में हमारे साथ चलने वाले एक अभेद्य सुरक्षा-कवच बन जाते हैं।
इस संबंध का एक गहरा नियम है: सद्गुरु ने हमेशा शिष्य का हाथ थामा हुआ है। उनकी पकड़ कभी ढीली नहीं पड़ती और न ही उनकी कृपा कभी कम होती है। दैवीय धारा बिना किसी भेदभाव के बहती है। किंतु, हाथ मिलाने के लिए दोनों पक्षों का जुड़ना आवश्यक है। शिष्य को भी अपनी ओर से वह हाथ पूरी दृढ़ता से थामे रखना होता है। जैसे ही हमारा ध्यान अत्यधिक सांसारिक आसक्तियों, अहंकार, प्रमाद या संदेह में भटकता है, हमारी पकड़ ढीली पड़ने लगती है।
यदि वह पकड़ पूरी तरह छूट जाए, तो संबंध विच्छिन्न हो जाता है। चैतन्य का सुरक्षा-प्रवाह हमारी चेतना से ओझल हो जाता है, और हम पुनः अशांत मन और कर्म-बंधनों के चक्रव्यूह में घिर जाते हैं। उस हाथ को छोड़ देने का अर्थ है आत्मिक यात्रा को फिर से शून्य से आरंभ करना। आध्यात्मिक दृष्टि से, इस अनमोल अवसर को गंवाना ठीक वैसा ही है जैसे इस मानव जन्म के द्वार पर आई मुक्ति की बस को चूक जाना। असावधानीवश इसे गंवाने का अर्थ हो सकता है मोक्ष तक पहुंचाने वाले ऐसे जीवित सेतु को पाने के लिए अनगिनत जन्मों तक पुनः प्रतीक्षा करना।
हमें एक जीवित सद्गुरु और सहज समर्पण का पावन मार्ग प्राप्त हुआ है। इस परम कृपा को सहजता से न लें। प्रतिदिन श्रद्धा से ध्यान में बैठें, अपनी चेतना को सहस्रार पर टिकाए रखें और अटूट निष्ठा से सद्गुरु का हाथ थामे रहें। जब आप पूरे अस्तित्व से उस हाथ को थाम लेते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवन के हर झंझावात में सद्गुरु सदैव आपके साथ थे, हैं और रहेंगे।

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