'मैं' वास्तव में क्या दर्शाता है?

 

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'मैं' वास्तव में क्या दर्शाता है?

मानव भाषा में 'मैं' से अधिक दृढ़ता, आवृत्ति और भावना के साथ कोई अन्य शब्द नहीं बोला जाता। यह वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द संपूर्ण मानवीय अनुभव घूमता है। हर महत्वाकांक्षा, हृदय-विदारक आघात, विजय और शिकायत इसी छोटे से सर्वनाम से बंधी है। फिर भी, अपनी जुबान पर इसके निरंतर प्रवाह के बावजूद, शायद ही कोई इसके वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करता है।

'मैं' वास्तव में क्या दर्शाता है?

इसका उत्तर एक गहन विरोधाभास प्रस्तुत करता है: 'मैं' शब्द मनुष्य के सबसे बड़े भ्रम और उसके परम सत्य—दोनों को व्यक्त कर सकता है। यह कौन सा रूप प्रकट करेगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी दृष्टि किस ओर है—क्या हम बाहर संसार की ओर देख रहे हैं या अपने अस्तित्व के मूल स्रोत की ओर अंतर्मुखी हैं।

सामान्य, सांसारिक अर्थ में 'मैं' अहंकार का प्रतीक है। जब हमारी चेतना बाहर की ओर केंद्रित होती है, तब हम 'माया' (भ्रम) के प्रभाव में जीवन जीते हैं। इस स्थिति में 'मैं' क्षणभंगुर और बाहरी उपाधियों से जुड़ जाता है: एक नश्वर शरीर, नाम, पद, संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा और रिश्तों का ताना-बाना। हम घोषणा करते हैं, "मैं सफल हूँ," "मैं आहत हूँ," "मैं धनवान हूँ," या "मैं असहाय हूँ।"

'मैं' का यह रूप अत्यंत नाजुक, चंचल और निरंतर असुरक्षा से भरा होता है। चूंकि यह उन वस्तुओं में अपनी जड़ें तलाशता है जो परिवर्तनशील, नश्वर और अंततः समाप्त होने वाली हैं, इसलिए अहंकार-चालित जीवन लालसा और भय के बीच एक अंतहीन झूला बनकर रह जाता है। इस बाहरी भ्रम में फंसा मनुष्य अभिनेता के मुखौटे को ही वास्तविक व्यक्ति समझने की भूल कर बैठता है और एक ऐसी अवास्तविक पहचान की रक्षा में लगा रहता है जिसका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है।

किंतु, जब अंतरतम में सत्य की वास्तविक प्यास जागती है, तब हमारे देखने की दिशा बदल जाती है। बाहरी जगत के पर्दे पर अपनी चेतना को बिखेरने के बजाय, हम अंतर्मुखी होने लगते हैं। हम यह मूलभूत प्रश्न पूछने लगते हैं: इस सब को देखने वाला साक्षी कौन है?

जब आप इस शरीर, क्षणभंगुर विचारों, गुजरती भावनाओं और कंडीशनिंग से भरी स्मृतियों को हटा देते हैं, तब अंत में क्या शेष रहता है?

भीतर देखने के इसी शांत अंतराल में 'मैं' का दूसरा और गूढ़ अर्थ प्रकट होने लगता है। अंतर्मुखी होते ही 'मैं' विचारों और इच्छाओं का संकुचित पुंज न रहकर विशुद्ध चेतना (आत्म-तत्व) के रूप में स्वयं को उद्घाटित करता है। अपने सर्वोच्च सत्य में 'मैं' वह शाश्वत, दिव्य उपस्थिति है जो केवल अस्तित्व की साक्षी है—असीम, अमिट और अखंड।

झूठे 'मैं' से वास्तविक 'मैं' तक की इस यात्रा को केवल बौद्धिक कसरतों या धर्मग्रंथों के पाठन मात्र से पूरा नहीं किया जा सकता। इस आंतरिक खोज के बीच में ही कृपा का अवतरण होता है। जब हमारी आध्यात्मिक तत्परता ईश्वरीय समय से मेल खाती है, तब पूज्यपाद श्री शिवकृपानन्द स्वामीजी जैसे आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु हमारे जीवन में पदार्पण करते हैं।

स्वामीजी कोई सैद्धांतिक मतवाद या जटिल अनुष्ठान नहीं थोपते। हिमालयन समर्पण ध्यानयोग के पावन मार्ग से वे हमें पूर्ण समर्पण का विज्ञान सिखाते हैं। उनकी दिव्य उपस्थिति में हम अपनी बिखरी हुई ऊर्जा को माया के भ्रामक संसार से समेटकर आत्मा के मौन में उतरना सीखते हैं।

प्रत्येक साधक के भीतर यह दिव्य संभावना पहले से विद्यमान है; आंतरिक दीपक भीतर मौजूद है, बस उसे प्रज्वलित करने की प्रतीक्षा है। स्वामीजी के प्रेमपूर्ण मार्गदर्शन और उनके सूक्ष्म ऊर्जा क्षेत्र से वह सुप्त दीपक प्रज्वलित हो उठता है। उस आंतरिक लौ के प्रकाश में अहंकार और देह-भाव के साए बिना किसी संघर्ष के स्वतः विलीन हो जाते हैं।

अंततः, अपनी इस वास्तविक पहचान की अनुभूति कोई अन्य व्यक्ति आपको उपहार में नहीं दे सकता। सद्गुरु पावन ज्योति जला सकते हैं और मार्ग दिखा सकते हैं, किंतु आत्म-साक्षात्कार का अनुभव प्रत्येक को स्वयं ही करना होता है। आपके लिए 'मैं' क्या दर्शाता है? क्या यह माया की दुनिया में परछाइयों के पीछे भागने वाला अहंकार का क्षणभंगुर मुखौटा है, या यह शाश्वत आनंद में स्थित विशुद्ध चेतना का अमर प्रकाश है? यह वह पावन यात्रा है जो प्रत्येक आत्मा को स्वयं तय करनी है।

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