देह-भाव की सीमा को पार करना

 

Photo Credit: Tony Kane MindHealth and Awareness

देह-भाव की सीमा को पार करना

इस भौतिक संसार में जन्म लेते ही हमारे कंडीशनिंग (संस्कार निर्माण) की एक व्यापक प्रक्रिया शुरू हो जाती है। हम विशुद्ध, निराकार चेतना के रूप में आते हैं, लेकिन तुरंत ही हमारे ऊपर बाहरी पहचान की परतें चढ़ा दी जाती हैं। हमें एक नाम दिया जाता है, एक परिवार से जोड़ा जाता है, धर्म की पहचान दी जाती है, और एक विशेष शहर, राज्य तथा देश की सीमाओं में बांध दिया जाता है। हमें सिखाया जाता है कि क्या 'हमारा' है और क्या 'दूसरों' का, हमारी सीमाएं कहाँ से शुरू होती हैं और कहाँ समाप्त होती हैं।

अनजाने में, हम इन बाहरी लेबलों को ही अपना वास्तविक सत्य मान लेते हैं। हम दर्पण में देखते हैं और स्वयं की पहचान पूरी तरह से उस साधन यानी भौतिक शरीर से कर बैठते हैं, और भीतर विराजमान मौन, दिव्य सारथी को भूल जाते हैं। यह गहरी जड़ें जमा चुकी पहचान ही देह-भाव (शरीर चेतना) का मूल कारण है।

देह-भाव में जीना हमें एक गहरे भ्रम में फंसा देता है। चूंकि यह भौतिक शरीर नश्वर, क्षणभंगुर और समय के आधीन है, इसलिए इससे बंधा जीवन निरंतर भय, असुरक्षा और अतृप्त इच्छाओं से संचालित होता है। हम अनजाने में दशकों तक क्षणभंगुर कामनाओं के पीछे भागते रहते हैं—पद, शारीरिक सुख, संग्रह और सामाजिक स्वीकृति। जैसे ही एक इच्छा पूरी होती है, दूसरी उसका स्थान ले लेती है, जिससे हम लालसा और असंतोष के अंतहीन चक्र में बंध जाते हैं। हम यह समझ ही नहीं पाते कि ये सभी इच्छाएं शरीर और इंद्रियों से उत्पन्न होती हैं। आत्मा को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वतः पूर्ण, अखंड और शाश्वत रूप से तृप्त है।

किंतु, कोई भी केवल बौद्धिक तर्कों से इस चक्रव्यूह से मुक्त नहीं हो सकता। देह-भाव से परे जाने के लिए अंतरतम से एक सच्ची और तीव्र तड़प का जागना आवश्यक है। यह तब घटित होता है जब आत्मा सांसारिक सुखों से थक जाती है और अपने वास्तविक स्वरूप के लिए पुकार उठती है।

जब यह निष्कपट तड़प जागती है, तो संपूर्ण ब्रह्मांड उसका उत्तर देता है। आध्यात्मिक नियम है कि जब शिष्य तैयार होता है, तब गुरु का प्राकट्य होता है। उसी निर्धारित क्षण में, शिवकृपानन्द स्वामीजी जैसे आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु हमारे जीवन में आते हैं और एक ऐसा आंतरिक रूपांतरण शुरू करते हैं जो हमारी दिशा ही बदल देता है।

स्वामीजी के माध्यम से हमें हिमालयन समर्पण ध्यानयोग की पावन पद्धति प्राप्त होती है। स्वामीजी सिखाते हैं कि देह-भाव से मुक्त होने के लिए शरीर या अहंकार से संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप हठ, दमन या कठोर तपस्या से देह-भाव की रेखा को मिटाने का प्रयास करेंगे, तो अनजाने में आप उसे और अधिक शक्ति प्रदान करेंगे।

इसके स्थान पर, स्वामीजी एक सुंदर उदाहरण देते हैं: किसी रेखा को छुए या मिटाए बिना छोटा करने का उपाय यह है कि उसके ठीक बगल में एक बहुत बड़ी रेखा खींच दी जाए। समर्पण ध्यान में हम अपनी सांसारिक कंडीशनिंग से लड़ते नहीं हैं; बल्कि हम सद्गुरु के सूक्ष्म, दिव्य ऊर्जा क्षेत्र में स्वयं को विलीन कर विराट चेतना से जुड़ जाते हैं। नियमित ध्यान के माध्यम से हम अपने आत्म-भाव (आत्मा चेतना) का विस्तार करते हैं। यह आध्यात्मिक जुड़ाव ही वह बड़ी रेखा बन जाता है।

जैसे-जैसे दैनिक ध्यान गहरा होता है, आत्म-भाव निरंतर बढ़ता जाता है। इस दिव्य प्रकाश के समक्ष पुराना देह-भाव धीरे-धीरे अत्यंत छोटा, गौण और महत्वहीन होने लगता है। अपनी अंतहीन चिंताओं और क्षणभंगुर वासनाओं वाला यह नश्वर शरीर पृष्ठभूमि में चला जाता है और उसका प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

स्वामीजी की असीम कृपा में केवल विशुद्ध आत्म-चेतना ही शेष रह जाती है। अब आप स्वयं को केवल अमर आत्मा मानते ही नहीं, बल्कि उसी भाव में जीते हैं। देह-भाव की सीमा पार हो जाती है। भौतिक बंधनों से मुक्त होकर जीवन अब व्यक्तिगत मांगों का संघर्ष नहीं रहता, बल्कि दैवीय प्रवाह बन जाता है। आप एक ऐसी अवस्था में प्रवेश कर जाते हैं जो सदैव आनंदमय, प्रेमपूर्ण और शांति से परिपूर्ण है।

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