जब हम 'मैं' को खोजते हैं, तब हम जागते हैं
जब हम 'मैं' को खोजते हैं, तब हम जागते हैं
हर सुबह जब हम अपनी आँखें खोलते हैं, तो हम दुनिया को एक व्यक्तिगत पहचान के नज़रिए से देखते हैं—एक ऐसा अस्तित्व जिसे हम 'मैं' कहते हैं। यह 'मैं' इच्छाएं करता है, चिंता करता है, निर्णय लेता है, योजनाएं बनाता है और लगातार बाहरी परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया करता है। जब हम इस 'मैं' के साथ देखते हैं, तो हम माया की उस स्वप्निल दुनिया में बंधे रहते हैं—एक ऐसा जटिल भ्रम जहाँ क्षणभंगुर परिस्थितियों को स्थायी सत्य मान लिया जाता है, और अस्थायी भावनाएं ही हमारे अस्तित्व को परिभाषित करने लगती हैं। इस स्थिति में, हमारी चेतना संकुचित रहती है और चंचल मन की सतह के ठीक नीचे स्थित विशाल, शांत आयामों से पूरी तरह अनभिज्ञ रहती है।
अहंकार के साथ देखने का अर्थ है बुद्धि के प्रत्येक प्रक्षेपण को ही अंतिम सत्य मान लेना। हम अपने नाम, अपने कार्य, अपने शरीर और अपने अस्थिर विचारों के साथ तादात्म्य बना लेते हैं। परंतु, जिस क्षण हम इस दृष्टि को उलट देते हैं—संसार को अपनी सीमित पहचान से देखने के बजाय, स्वयं इस पहचान के स्रोत की खोज करने लगते हैं—तभी यह स्वप्न टूटने लगता है। जब हम 'मैं' को खोजना शुरू करते हैं, और भीतर गहरे में यह मौन प्रश्न पूछते हैं, "इस सब का अनुभव करने वाला वास्तव में कौन है?", तो यह मिथ्या 'मैं' विलीन होने लगता है। उस दिव्य नीरवता में, हम चेतना की उन गहन और उच्च अवस्थाओं में जाग उठते हैं, जिनसे हम पहले पूरी तरह अनभिज्ञ थे। तब हमें यह बोध होता है कि हमारा वास्तविक स्वरूप मन की वाणी नहीं, बल्कि वह विशुद्ध, निर्लिप्त साक्षी चेतना है जिसमें यह वाणी जन्म लेती है और शांत हो जाती है।
यह उच्च चेतना कोई बाहरी उपलब्धि या केवल कुछ गिने-चुने लोगों के लिए आरक्षित कोई दूर का लक्ष्य नहीं है। यह प्रत्येक व्यक्ति के भीतर पहले से ही एक शांत संभावना के रूप में विद्यमान है। लेकिन जिस प्रकार कोई बिना बोया गया बीज बंजर भूमि में स्वतः अंकुरित नहीं हो सकता, उसी प्रकार हमारी यह सुप्त दिव्यता भी सांसारिक संस्कारों और मानसिक बंधनों के नीचे दबी रहती है।
यहीं पर एक जीवित सद्गुरु की कृपा अनिवार्य हो जाती है। जब हम परम पूज्य श्री शिवकृपानंद स्वामीजी जैसे आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु के चरणों में पूर्ण समर्पण करते हैं, तब भीतर एक गहन रूपांतरण प्रारंभ होता है। स्वामीजी कोई सैद्धांतिक मत या शुष्क बौद्धिक दर्शन नहीं देते; वे अपनी दिव्य कृपा से हमारी अंतरात्मा में सीधे आध्यात्मिकता का चैतन्य बीज रोपित करते हैं। यह दीक्षा हमारे सूक्ष्म ऊर्जा केंद्रों को जागृत कर भीतर स्थित ईश्वरत्व की सोई हुई चेतना को प्रज्वलित कर देती है।
परंतु, इस आध्यात्मिक बीज को प्राप्त करना अंतर्यात्रा का केवल आरंभ है। सद्गुरु दीक्षा का उपहार प्रदान करते हैं, किंतु उस उपहार को सींचने और सहेजने का दायित्व पूरी तरह हमारे ऊपर होता है। नियमित, निष्ठावान और समर्पित ध्यान के माध्यम से इस पावन बीज को सींचना हमारा कर्तव्य है। जिस प्रकार एक छोटे से पौधे को निरंतर जल, धूप और उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार उच्च चेतना के इस बीज को प्रतिदिन अंतर्मुखी होकर मौन ध्यान के जल से सींचने की आवश्यकता होती है। नियमित अभ्यास के बिना सबसे प्रभावशाली बीज भी निष्क्रिय पड़ा रहता है; पर अविचल निष्ठा और समर्पण से यह धीरे-धीरे चेतना की गहराइयों में अपनी जड़ें जमा लेता है।
समय, धैर्य और निरंतर साधना के साथ यह कोमल अंकुर एक विशाल, सुदृढ़ और अडिग वटवृक्ष का रूप ले लेता है। वटवृक्ष की जड़ें गहरी और फैली हुई होती हैं, और उसकी विशाल शाखाएं सांसारिक तूफानों के बीच भी सबको आश्रय, स्थिरता और अटूट शांति प्रदान करती हैं। जब हमारी आध्यात्मिक साधना इस गहराई को प्राप्त कर लेती है, तो मन बाहरी हलचलों से डगमगाना बंद कर देता है। हम सहज ही माया के बंधन से बाहर निकल आते हैं और अलगाव, भय तथा अहं-प्रेरित इच्छाओं के भ्रम से परे चले जाते हैं।
इस उच्च अवस्था में हमारी व्यक्तिगत तरंगें ब्रह्मांडीय स्पंदनों के साथ पूरी तरह लयबद्ध हो जाती हैं। फिर हम जीवन के प्रवाह के विरुद्ध संघर्ष नहीं करते; बल्कि सृष्टि की नैसर्गिक धारा के साथ एकाकार होकर शुद्ध मौन, असीम प्रेम और निरंतर ईश्वरीय चेतना में स्थिर हो जाते हैं।

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