मन जब मन को खोजे – पाता है कि मन नहीं है ह
Photo Credit: Instagram मन जब मन को खोजे – पाता है कि मन नहीं है हम अक्सर मन को अपने अस्तित्व का केंद्र मानते हैं। वह सोचता है, विश्लेषण करता है और प्रतिक्रिया देता है, और हम स्वयं को उसकी गतिविधियों से जोड़ लेते हैं। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, मन अंतिम सत्य नहीं है। जब मन स्वयं को खोजता है, तो वह पाता है कि मन कुछ नहीं—केवल विचारों और संस्कारों का समूह है। और जब मन भीतर जाकर स्वयं की जाँच करता है, तो वह देखता है कि मन नहीं है—केवल चेतना का विशाल विस्तार, मौन और आनंद है। यह अनुभूति बौद्धिक प्रयास से नहीं, बल्कि निःशर्त समर्पण से आती है। मन स्वभाव से मौन का विरोध करता है। वह नियंत्रण और गतिविधि चाहता है। लेकिन समर्पण ध्यान में साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है। इस समर्पण में मन की चंचलता मिटने लगती है। सतगुरु की तरंगें चेतना को शुद्ध करती हैं और साधक धीरे-धीरे अनुभव करता है कि मन वास्तविक नहीं, केवल क्षणिक है। स्वामीजी बताते हैं कि इस रूपांतरण के लिए स्थिरता, नियमितता और समर्पण आवश्यक है। मन को एक बार म...