क्या कोई वास्तव में व्यथित हो सकता है?

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 क्या कोई वास्तव में व्यथित हो सकता है?

जीवन में परिस्थितियाँ हमें बार-बार चुनौती देती हैं—विवाद, निराशाएँ, हानियाँ और अचानक बदलाव। ऐसे समय में हम कहते हैं कि हम “व्यथित” हैं। लेकिन गहरे आध्यात्मिक अर्थ में क्या कोई वास्तव में व्यथित हो सकता है? हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की शिक्षाएँ, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, हमें यह समझने में मदद करती हैं कि शरीर और आत्मा में अंतर है।

शरीर और मन परिस्थितियों से बंधे होते हैं। वे बाहरी घटनाओं पर प्रतिक्रिया करते हैं और अशांति उत्पन्न करते हैं। लेकिन स्वामीजी याद दिलाते हैं कि यह अशांति शरीर और मन की है, आत्मा की नहीं। आत्मा शुद्ध, मौन और शाश्वत है।

जब हम शरीर चेतना में जीते हैं, तो हम मन की प्रतिक्रियाओं से स्वयं को जोड़ लेते हैं। लेकिन जब हम आत्मा चेतना में प्रवेश करते हैं, तो हमें अनुभव होता है कि आत्मा इन उतार-चढ़ाव से परे है। आत्मा व्यथित नहीं होती, वह केवल साक्षी रहती है।

समर्पण ध्यानयोग का अभ्यास हमें इस सत्य तक ले जाता है। सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को समर्पित करने से हम शरीर चेतना से अलग होते हैं। सतगुरु की तरंगें मन को शुद्ध करती हैं और आत्मा को जागृत करती हैं। धीरे-धीरे हम शरीर की अशांति से अलग होकर आत्मा के मौन में विश्राम करने लगते हैं।

स्वामीजी कहते हैं कि बाहरी परिस्थितियाँ समुद्र की सतह पर उठती लहरों जैसी हैं। वे उठती और गिरती रहती हैं। लेकिन समुद्र की गहराई शांत रहती है। आत्मा भी हमारी गहराई है। जब हम सतगुरु से जुड़ते हैं और आत्मा चेतना में जीते हैं, तो हम उसी गहराई में विश्राम करते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि चुनौतियाँ समाप्त हो जाती हैं। जीवन हमें परखता रहेगा। लेकिन आत्मा चेतना में जीते हुए हम प्रतिक्रिया नहीं, उत्तर देते हैं। हम करुणा और सजगता से कार्य करते हैं। व्यथित होना सतह का गुण है, शांति आत्मा का।

अंततः प्रश्न “क्या कोई वास्तव में व्यथित हो सकता है?” समर्पण के प्रकाश में मिट जाता है। शरीर और मन व्यथित हो सकते हैं, लेकिन आत्मा कभी नहीं। ध्यान और समर्पण से हम आत्मा से जीना सीखते हैं। और इस जीवन में शांति हमारा स्वाभाविक स्वरूप बन जाती है।

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