कार्य का महत्व: ध्यान का प्रवाह जीवन में
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कार्य का महत्व: ध्यान का प्रवाह जीवन में
कार्य को अक्सर बोझ या केवल जीविका का साधन माना जाता है। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से कार्य एक पवित्र अवसर है। यह वह क्षेत्र है जहाँ ध्यान जीवन में प्रवाहित होता है और सजगता कर्म में बदल जाती है।
स्वामी शिवकृपानंदजी बताते हैं कि ध्यान केवल आसन तक सीमित नहीं है। यह जीवन के हर पहलू में उतरना चाहिए। जब हम ध्यान से शुद्ध चित्त को कार्य में लाते हैं, तो हम मौन से कार्य करते हैं, अहंकार से नहीं। कार्य उपलब्धि का साधन नहीं, बल्कि अर्पण बन जाता है। हर क्रिया उपस्थिति से भर जाती है और कार्य पूजा का रूप ले लेता है।
मन अक्सर अतीत और भविष्य में भटकता है, लेकिन सच्ची उत्पादकता केवल वर्तमान में होती है। ध्यान हमें वर्तमान में स्थिर करता है। जब हम वर्तमान में कार्य करते हैं, तो हम सजग, जीवंत और पूर्णतः उपस्थित होते हैं। यही उपस्थिति कार्यक्षमता और आनंद को बढ़ाती है। तनाव मिट जाता है क्योंकि तनाव वर्तमान का विरोध है। जब हम वर्तमान को स्वीकारते हैं, तो कठिन कार्य भी सहज हो जाते हैं।
कार्य सेवा का माध्यम भी है। स्वामीजी याद दिलाते हैं कि जीवन का उद्देश्य आत्मकेंद्रित उपलब्धि नहीं, बल्कि निःस्वार्थ सेवा है। चाहे पेशेवर कार्य हो, घरेलू जिम्मेदारी हो या रचनात्मक अभिव्यक्ति—हर कार्य सेवा का माध्यम बन सकता है जब वह सजगता और समर्पण से किया जाए।
समर्पण ध्यानयोग का अभ्यास करने वालों के लिए वर्तमान में कार्य करने से गहरे लाभ मिलते हैं। मन स्पष्ट होता है, त्रुटियाँ कम होती हैं। कार्य संघर्ष नहीं, अर्पण बन जाता है। सजगता कार्यक्षमता और रचनात्मकता बढ़ाती है। कार्य थकान नहीं, संतोष देता है। और आध्यात्मिक रूप से, हर कार्य आत्महीनता और समर्पण की ओर कदम बन जाता है।
कार्य केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि आत्मिक विकास का मार्ग है। यह ध्यान और जीवन के बीच का पुल है। जब हम वर्तमान में सजगता और समर्पण से कार्य करते हैं, तो कार्य ध्यान का प्रवाह बन जाता है। इस अनुभूति में हर क्षण मुक्ति की ओर एक कदम बन जाता है।

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