परमात्मा देखा नहीं, अनुभव किया जाता है

 

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परमात्मा देखा नहीं, अनुभव किया जाता है

मनुष्य सदैव उस परम सत्य को जानने की आकांक्षा रखता है, जो समस्त अस्तित्व को धारण करता है। यही सत्य है परमात्मा—अनंत चेतना, जो रूप और सीमा से परे है। परमात्मा को आँखों से देखा नहीं जा सकता, न ही बुद्धि से समझा जा सकता है। उसे केवल अनुभव किया जा सकता है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में यह अनुभव सतगुरु के माध्यम से संभव होता है, जो साधक और अनंत के बीच जीवंत सेतु बनते हैं।

आँखें केवल रूप देख सकती हैं और मन केवल विचार पकड़ सकता है। लेकिन परमात्मा निराकार है, विचारों से परे है। उसे देखने का प्रयास करना उसके सार को खो देना है। जैसे हवा को मुट्ठी में पकड़ना असंभव है, वैसे ही परमात्मा को देखा नहीं जा सकता, केवल मौन में अनुभव किया जा सकता है।

श्री शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं कि सतगुरु गुरु तत्व का जीवंत स्वरूप हैं। जब साधक ध्यान में सहस्रार पर चित्त समर्पित करता है, तो सतगुरु की ऊर्जा प्रवाहित होती है। यह प्रवाह कोई दृश्य नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म कंपन है। यह चेतना को शुद्ध करता है, अहंकार को मिटाता है और आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप तक जागृत करता है। इसी जागृति में साधक परमात्मा का अनुभव करता है—बाहरी रूप में नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व के सार के रूप में।

सतगुरु का मौन ही इस परिवर्तन का आधार है। सतगुरु शब्दों से परमात्मा की व्याख्या नहीं करते, बल्कि मौन की तरंगें देते हैं। जब शिष्य समर्पण में बैठता है, तो ये तरंगें आत्मा में प्रवेश करती हैं और जागरूकता को जगाती हैं। शिष्य एक ऐसी उपस्थिति को अनुभव करता है जो विचारों से परे, रूप से परे और इंद्रियों से परे है। यही उपस्थिति परमात्मा है।

परमात्मा का अनुभव किसी अद्भुत दृश्य या चमत्कार में नहीं है। यह सरलता में है—स्वयं में विश्राम की शांति, मौन में विलीन होने का आनंद, जीवन को बिना विकृति के देखने की स्पष्टता। इसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता, केवल जिया जा सकता है।

सतगुरु साधक को शरीर चेतना से आत्मा चेतना की ओर ले जाते हैं। शरीर चेतना पहचान, इच्छाओं और भय से बंधी होती है। वह देखना और पकड़ना चाहती है। आत्मा चेतना व्यापक और मुक्त होती है। वह परमात्मा को देखने की कोशिश नहीं करती, क्योंकि जानती है कि परमात्मा कोई वस्तु नहीं है। वह केवल मौन में विश्राम करती है और अनुभव को स्वाभाविक रूप से आने देती है।

नियमित साधना से साधक में सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं। मन शांत होता है, हृदय खुलता है, आत्मा प्रकाशित होती है। करुणा, विनम्रता और समर्पण सहज रूप से प्रकट होते हैं। ये संकेत परमात्मा को देखने के नहीं, बल्कि अनुभव करने के हैं। साधक समझता है कि परमात्मा कहीं बाहर नहीं, बल्कि यहीं है—अभी, भीतर और चारों ओर, समस्त अस्तित्व में प्रवाहित।

अंततः परमात्मा कोई गंतव्य नहीं, बल्कि अनुभव है। उसे आँखों से देखा नहीं जा सकता, लेकिन ध्यान के मौन में महसूस किया जा सकता है। उसे बुद्धि से समझा नहीं जा सकता, लेकिन समर्पण से जिया जा सकता है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में सतगुरु इस द्वार को खोलते हैं और साधक को परमात्मा के जीवंत अनुभव तक ले जाते हैं। और इस अनुभव में साधक पाता है कि अनंत कहीं बाहर नहीं, बल्कि उसका अपना स्वरूप है।

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