मन जब मन को खोजे – पाता है कि मन नहीं है ह
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मन जब मन को खोजे – पाता है कि मन नहीं है
हम अक्सर मन को अपने अस्तित्व का केंद्र मानते हैं। वह सोचता है, विश्लेषण करता है और प्रतिक्रिया देता है, और हम स्वयं को उसकी गतिविधियों से जोड़ लेते हैं। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, मन अंतिम सत्य नहीं है। जब मन स्वयं को खोजता है, तो वह पाता है कि मन कुछ नहीं—केवल विचारों और संस्कारों का समूह है। और जब मन भीतर जाकर स्वयं की जाँच करता है, तो वह देखता है कि मन नहीं है—केवल चेतना का विशाल विस्तार, मौन और आनंद है।
यह अनुभूति बौद्धिक प्रयास से नहीं, बल्कि निःशर्त समर्पण से आती है। मन स्वभाव से मौन का विरोध करता है। वह नियंत्रण और गतिविधि चाहता है। लेकिन समर्पण ध्यान में साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है। इस समर्पण में मन की चंचलता मिटने लगती है। सतगुरु की तरंगें चेतना को शुद्ध करती हैं और साधक धीरे-धीरे अनुभव करता है कि मन वास्तविक नहीं, केवल क्षणिक है।
स्वामीजी बताते हैं कि इस रूपांतरण के लिए स्थिरता, नियमितता और समर्पण आवश्यक है। मन को एक बार में शांत नहीं किया जा सकता। इसके लिए धैर्य और सतगुरु पर विश्वास चाहिए। हर ध्यान में मन को विश्राम का निमंत्रण मिलता है। हर समर्पण अहंकार को कमजोर करता है और आत्मा चेतना को मजबूत करता है। समय के साथ मन स्वयं को खोजता है और खोज में विलीन हो जाता है।
जो शेष रहता है, वह शून्यता नहीं, बल्कि पूर्णता है। साधक चेतना के विशाल विस्तार का अनुभव करता है, जो विचार और पहचान से परे है। यह मौन दमन का नहीं, बल्कि मुक्ति का मौन है। यह आनंद परिस्थितियों पर निर्भर नहीं, बल्कि आत्मा से उत्पन्न होता है। इसी अवस्था में साधक समझता है कि मुक्ति मन को नियंत्रित करने से नहीं, बल्कि उसे पार करने से मिलती है।
मन पहले विरोध करता है, संदेह और विक्षेप पैदा करता है। लेकिन सतगुरु के मार्गदर्शन में साधक स्थिर रहना सीखता है। गुरु की उपस्थिति दीपक की तरह है, जो मार्ग को प्रकाशित करती है। नियमित साधना से साधक देखता है कि मन मृगतृष्णा जैसा है। जब उसका पीछा किया जाता है तो वह वास्तविक लगता है, लेकिन जब खोजा जाता है तो वह मिट जाता है।
यह मिटना ही मुक्ति है। साधक अब विचारों और भावनाओं से नहीं जुड़ता। वह आत्मा चेतना में विश्राम करता है। मन, जो कभी शासक लगता था, अब भ्रम सिद्ध होता है। शेष रहता है अस्तित्व का सत्य—परमात्मा, जो मौन, आनंद और स्वतंत्रता के रूप में अनुभव होता है।
इस प्रकार स्वामीजी का संदेश स्पष्ट है: जब मन स्वयं को खोजता है, तो वह पाता है कि मन नहीं है। निःशर्त समर्पण, नियमित साधना और सतगुरु के मार्गदर्शन से साधक मन के भ्रम को पार करता है और चेतना के विशाल विस्तार में जागृत होता है। यही जागृति मुक्ति है।

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