पूर्णिमा का सामूहिक ध्यान: चंद्र ऊर्जा का आलोक

 

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पूर्णिमा का सामूहिक ध्यान: चंद्र ऊर्जा का आलोक

पूर्णिमा सदैव आध्यात्मिक परंपराओं में विशेष स्थान रखती है। उसकी उज्ज्वल आभा सम्पूर्णता, स्पष्टता और विस्तार का प्रतीक है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में पूर्णिमा केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ने का अवसर है। जब साधक सामूहिक रूप से ध्यान करते हैं, तो वे चंद्र ऊर्जा के उस स्रोत को स्पर्श करते हैं जो आत्मा को पोषण देता है और जागरूकता को गहरा करता है।

स्वामी शिवकृपानंदजी बताते हैं कि ध्यान सामूहिकता में और अधिक प्रभावी होता है। जैसे एक दीपक कमरे को रोशन करता है, वैसे अनेक दीपक मिलकर अद्भुत प्रकाश फैलाते हैं। पूर्णिमा इस अनुभव में एक नया आयाम जोड़ती है। उसकी ऊर्जा शीतल, शांत और विस्तारशील होती है। यह मन को संतुलित करती है, भावनाओं को स्थिर करती है और हृदय को समर्पण के लिए खोलती है।

चंद्र ऊर्जा क्यों महत्वपूर्ण है?

चंद्रमा हमारे सूक्ष्म लयोंभावनाओं, आंतरिक तरंगों और अवचेतन प्रवृत्तियोंको नियंत्रित करता है। पूर्णिमा पर ये लय चरम पर होती हैं। मन अधिक संवेदनशील होता है, हृदय अधिक खुला होता है और आत्मा अधिक ग्रहणशील होती है। जब हम इस समय सामूहिक ध्यान करते हैं, तो हम इस उच्च ऊर्जा से जुड़ते हैं। चित्त सहजता से शुद्ध होता है और गुरु तत्व से जुड़ाव गहरा होता है।

समर्पण ध्यानयोग में ध्यान प्रयास नहीं, बल्कि समर्पण है। पूर्णिमा के सामूहिक ध्यान में यह समर्पण सहज हो जाता है। चंद्र ऊर्जा प्रतिरोध को नरम करती है, अशांति को मिटाती है और मौन की ओर प्रवाह उत्पन्न करती है। हम चित्त को सहस्रार पर रखते हैं और गुरु की ऊर्जा अधिक प्रचुरता से प्रवाहित होती है। आत्मा का अनुभव विस्तार का होता हैजैसे स्वयं चंद्रमा, उज्ज्वल और पूर्ण।

सामूहिक ध्यान एक शक्तिशाली चेतना क्षेत्र बनाता है। प्रत्येक साधक सामूहिक ऊर्जा में योगदान देता है और उससे प्राप्त करता है। यह पारस्परिक आदान-प्रदान अनुभव को गहरा करता है। चाहे कोई अकेले ध्यान करे, यदि वह भीतर से सामूहिकता से जुड़ता है, तो प्रभाव गहन होता है। स्वामीजी याद दिलाते हैं कि गुरु तत्व सार्वभौमिक हैयह दूरी से परे है। इस प्रकार पूर्णिमा का ध्यान एक वैश्विक समर्पण की लहर बन जाता है।

पूर्णिमा ध्यान के लाभ सूक्ष्म और व्यावहारिक दोनों हैं। मन स्पष्ट होता है, भावनाएँ स्थिर होती हैं और जागरूकता तीव्र होती है। साधक अधिक जीवंत, अधिक उपस्थित और आत्मा से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। चंद्रमा की शीतल ऊर्जा मन की अग्नि प्रवृत्तियों को संतुलित करती है और शांति लाती है। आत्मा अमृत वर्षा में स्नान करती है।

पूर्णिमा हमें सम्पूर्णता की याद दिलाती है। जैसे चंद्रमा पूर्ण रूप से चमकता है, वैसे ही हम भीतर से पूर्ण हैं। ध्यान हमें यह अनुभव कराता है कि हम खंडित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण हैं। पूर्णिमा एक दर्पण बन जाती है, जो हमारे सच्चे स्वरूप को प्रतिबिंबित करती है।

तो जब पूर्णिमा उदित हो, उसे स्मरण बनाइए। रुकिए, सामूहिक रूप से बैठिए, समर्पण कीजिए। चित्त को सहस्रार पर रखिए और गुरु की ऊर्जा को प्रवाहित होने दीजिए। चंद्र ऊर्जा को आत्मा को शुद्ध करने, विस्तार देने और उत्थान करने दीजिए। उस मौन में आप केवल ध्यान नहीं करेंगेआप ब्रह्मांडीय लय में विलीन हो जाएंगे।

पूर्णिमा का सामूहिक ध्यान केवल साधना नहीं, बल्कि उत्सव है। प्रकाश, समर्पण और एकता का उत्सव। आत्मा की यात्रा का उत्सव। और इस उत्सव में हम पाते हैं कि बाहर का चंद्रमा भीतर की ज्योति का प्रतिबिंब है।

 


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