समर्पण ध्यान: सतगुरु से संस्कारों का संचार
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समर्पण ध्यान: सतगुरु से संस्कारों का संचार
ध्यान को अक्सर मन को शांत करने का अभ्यास माना जाता है। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में ध्यान कहीं अधिक गहरा है—यह सतगुरु से शिष्य तक मूल्यों का संचार है। यह केवल तकनीक नहीं, बल्कि चेतना का पवित्र प्रवाह है, जो आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप तक जागृत करता है।
श्री शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं कि सतगुरु केवल शब्दों के शिक्षक नहीं, बल्कि मौन, समर्पण, करुणा, विनम्रता और सत्य जैसे मूल्यों के जीवंत स्वरूप हैं। जब साधक शुद्ध हृदय से बैठता है और चित्त को सहस्रार पर समर्पित करता है, तो गुरु तत्व प्रवाहित होने लगता है। यह प्रवाह बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि सूक्ष्म ऊर्जा है, जो सतगुरु के मूल्यों को शिष्य की चेतना में अंकित करती है।
यह संचार ही समर्पण ध्यान की विशेषता है। साधक को मूल्यों को प्रयास से अर्जित करने की आवश्यकता नहीं होती। समर्पण के द्वारा सतगुरु के मूल्य आत्मा में स्वतः उतरते हैं। मन भटक सकता है, लेकिन आत्मा ग्रहण करती है। धीरे-धीरे साधक सतगुरु के गुणों को प्रतिबिंबित करने लगता है—नकल से नहीं, बल्कि आंतरिक रूपांतरण से।
यह प्रक्रिया आत्मा चेतना से गहराई से जुड़ी है। शरीर चेतना अहंकार और इच्छाओं से बंधी होती है। लेकिन आत्मा चेतना मौन, व्यापक और मुक्त होती है। सतगुरु के मूल्य शरीर चेतना को मिटाकर आत्मा चेतना को जागृत करते हैं। शिष्य मन से नहीं, हृदय से जीने लगता है—अहंकार से नहीं, समर्पण से।
स्वामीजी कहते हैं कि सतगुरु आत्मा को शब्द नहीं, तरंगें देते हैं। ये तरंगें मौन में मूल्यों का संचार करती हैं। इसलिए समर्पण ध्यान में समर्पण आवश्यक है। बिना समर्पण के मन प्रवाह को रोकता है। समर्पण से आत्मा खुलती है और सतगुरु के मूल्य सहजता से उतरते हैं।
ये मूल्य जीवन में प्रकट होते हैं। मौन प्राप्त करने वाला साधक कार्य और संबंधों में शांत होता है। करुणा प्राप्त करने वाला क्षमाशील होता है। विनम्रता प्राप्त करने वाला अहंकार से मुक्त होता है। ये परिवर्तन प्रयास से नहीं, बल्कि आत्मा के सतगुरु के स्वरूप को प्रतिबिंबित करने से होते हैं।
इस प्रकार समर्पण ध्यान सीखने का नहीं, बनने का मार्ग है। यह शिष्य को धीरे-धीरे सतगुरु के मूल्यों के अनुरूप रूपांतरित करता है। ध्यान साधक द्वारा नहीं, बल्कि गुरु द्वारा साधक के माध्यम से होता है। साधक का कार्य केवल समर्पण करना है।
समर्पण ध्यान व्यक्ति और सार्वभौमिक चेतना के बीच का पुल है। सतगुरु, जो सार्वभौमिक चेतना में स्थित हैं, शिष्य को वही चेतना प्रदान करते हैं। शिष्य शरीर से आत्मा की ओर, अहंकार से समर्पण की ओर, और विभाजन से एकता की ओर बढ़ता है। और इस एकता में ध्यान का सच्चा उद्देश्य पूर्ण होता है—अभ्यास नहीं, बल्कि जीवंत रूपांतरण।

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