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जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सच्चा सुख केवल आत्मा से आता है

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  Photo Credit: Dadabhagwan.com सच्चा सुख केवल आत्मा से आता है सुख की खोज में अधिकांश लोग बाहर की ओर देखते हैं—संपत्ति, उपलब्धियाँ, संबंध या भौतिक सुखों की ओर। ये स्रोत क्षणिक आनंद दे सकते हैं, लेकिन स्थायी नहीं होते। भौतिक सुख अस्थायी है; परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है। शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं कि सच्चा सुख केवल आत्मा से आता है। यह बाहरी जगत पर निर्भर नहीं है, बल्कि भीतर से स्वतः प्रवाहित होता है। स्वामीजी समझाते हैं कि आत्मा हमारे अस्तित्व का शाश्वत केंद्र है। यह मन के उतार-चढ़ाव और जीवन की परिस्थितियों से अछूता रहता है। जब हम शरीर या अहंकार से पहचान करते हैं, तो सुख नाजुक हो जाता है। लेकिन जब हम आत्मा में विश्राम करते हैं, तो सुख स्थिर, उज्ज्वल और निःशर्त हो जाता है। ध्यान इस आंतरिक आनंद का द्वार है। समर्पण ध्यान में साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है। मन शांत होता है, अहंकार मिटता है और आत्मा जागृत होती है। इस जागृत अवस्था में सुख बाहर नहीं खोजा जाता, बल्कि भीतर पाया जाता है। आत्मा का आनंद क्षणिक नहीं, बल्कि स्थायी है, क्योंकि यह शुद्ध चेतना से उत्पन...

अपने भीतर के आश्रय में लौटो

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  Photo Credit: Pinterest अपने भीतर के आश्रय में लौटो आधुनिक जीवन अक्सर भारी प्रतीत होता है। कार्य, संबंध और जिम्मेदारियों की निरंतर माँगें ऐसा शोर उत्पन्न करती हैं जो आत्मा की सूक्ष्म आवाज़ को दबा देती हैं। हम शांति की खोज बाहरी आश्रमों, पर्वतों या वन-स्थलों में करते हैं, लेकिन सबसे गहरा आश्रय बाहर नहीं, भीतर है। शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं कि सच्चा आश्रम आत्मा की ओर यात्रा है—अपने भीतर के आश्रय में लौटना। यह आंतरिक आश्रय मौन, आनंद और शुद्ध चेतना का स्थान है। यह सदैव उपस्थित है, परंतु अहंकार, इच्छाओं और मानसिक कोलाहल की परतों के नीचे छिपा रहता है। इसे पाने के लिए बाहरी अव्यवस्था को छोड़ना और पूर्ण समर्पण करना आवश्यक है। स्वामीजी बताते हैं कि निःशर्त समर्पण —सतगुरु के प्रति पूर्ण आत्म-निवेदन—इस आश्रय में प्रवेश की कुंजी है। जब साधक ध्यान में बैठकर सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है, तो मन की चंचलता शांत होने लगती है। सतगुरु की तरंगें चेतना को शुद्ध करती हैं, अहंकार और भ्रम मिटते हैं। धीरे-धीरे साधक अनुभव करता है कि बाहरी जगत की पकड़ ढीली हो रही है और आंतरिक जगत प्रध...

अहंकार – आत्मा और शुद्ध चेतना के बीच की गाँठ

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  Photo Credit: Instagram अहंकार – आत्मा और शुद्ध चेतना के बीच की गाँठ आध्यात्मिक यात्रा का सार अहंकार का विलय है। अहंकार वह गाँठ है जो व्यक्ति को भ्रम से बाँधती है और आत्मा को शुद्ध चेतना से जुड़ने से रोकती है। यह वह बाधा है जो दृष्टि को विकृत करती है और आत्मा तथा अनंत के बीच अलगाव उत्पन्न करती है। जब तक अहंकार है, आत्मा शुद्ध चेतना के विशाल विस्तार में नहीं जुड़ सकती। अहंकार अनेक सूक्ष्म रूपों में प्रकट होता है—गर्व, भय, इच्छा, निर्णय और आसक्ति। यह निरंतर बदलता रहता है ताकि अपनी पकड़ बनाए रखे। यहाँ तक कि साधना में भी अहंकार उपलब्धि या श्रेष्ठता के रूप में छिप सकता है। यही कारण है कि अहंकार को मार्ग की सबसे बड़ी बाधा माना जाता है। इसे मिटाने के लिए आंशिक प्रयास नहीं, बल्कि पूर्ण और निःशर्त समर्पण आवश्यक है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, अहंकार को पार करने की कुंजी समर्पण है। जब साधक ध्यान में बैठकर सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है, तो सतगुरु की तरंगें चेतना को शुद्ध करती हैं। अहंकार, जो नियंत्रण और विरोध पर जीवित रहता है, धी...

भाग्य क्या है?

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  Photo Credit: A-Z Quotes भाग्य क्या है? भाग्य मानव जीवन का सबसे गहन प्रश्न है। हम अक्सर सोचते हैं कि क्या हमारा जीवन पूर्वनिर्धारित है या हमारे कर्मों से निर्मित होता है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, भाग्य और कर्म गहराई से जुड़े हुए हैं। भाग्य वास्तव में कर्म का ही unfold होना है—इस जन्म और पिछले जन्मों के कर्मों का परिणाम। कर्म कारण और परिणाम का नियम है। हर विचार, हर वचन और हर कर्म हमारी चेतना में संस्कार उत्पन्न करता है। यही संस्कार हमारे अनुभवों को आकार देते हैं, जिसे हम भाग्य कहते हैं। जीवन में मिलने वाले सुख और दुख आकस्मिक नहीं होते, वे कर्म के फल होते हैं। लेकिन स्वामीजी बताते हैं कि भाग्य डरने की चीज़ नहीं है। यह एक शिक्षक है, जो हमें आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। जब साधक सतगुरु से दीक्षा लेता है, तो एक गहन रूपांतरण होता है। स्वामीजी बताते हैं कि इस जन्म का कर्म उसी क्षण निष्प्रभावी हो जाता है। साधक अब वर्तमान जन्म के कर्म का बोझ नहीं उठाता। शेष रहता है केवल पिछले जन्मों का कर्म, जिसे सहना पड़ता है। लेकिन यदि साधक पू...

दो विचारों के बीच का अंतराल ही ध्यान है

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  Photo Credit: in.pinterest.com दो विचारों के बीच का अंतराल ही ध्यान है मानव मन एक चंचल साधन है। यह निरंतर विचार उत्पन्न करता रहता है—अतीत की स्मृतियाँ, भविष्य की कल्पनाएँ, इच्छाएँ, भय और निर्णय। यह निरंतर कोलाहल हमें भीतर की मौनता का अनुभव करने से रोकता है। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की परंपरा में, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, ध्यान विचारों से लड़ने का नाम नहीं है, बल्कि उनके बीच के अंतराल को खोजने का मार्ग है। वही अंतराल शुद्ध मौन है और उसी मौन में आनंद छिपा है। जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो सबसे पहले मन की बातें सुनाई देती हैं। विचार एक के बाद एक उठते हैं, जैसे समुद्र की लहरें। प्रारंभ में लगता है कि उन्हें रोकना असंभव है। लेकिन स्वामीजी बताते हैं कि लक्ष्य विचारों को दबाना नहीं है। हमें केवल उन्हें देखना है। जब हम बिना आसक्ति के देखते हैं, तो विचारों का प्रवाह धीमा होने लगता है। दो विचारों के बीच एक अंतराल प्रकट होता है—स्थिरता का स्थान। यही अंतराल ध्यान है। यही आत्मा का द्वार है। उस स्थान में मन शून्य हो जाता है, अहंकार मिट जाता है और आत्मा प्रकाशित होती है। ब...

केवल होना ही हमारा स्वभाव है

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  Photo Credit: in.pinterest.com केवल होना ही हमारा स्वभाव है दैनिक जीवन की भागदौड़ में हम अक्सर अस्तित्व की सरलता को भूल जाते हैं। हम अपनी भूमिकाओं, जिम्मेदारियों और उपलब्धियों से स्वयं को जोड़ लेते हैं और मानते हैं कि जीवन का अर्थ निरंतर करने में है। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की परंपरा में, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, हमारा वास्तविक स्वभाव करने में नहीं, बल्कि होने में है। केवल होना ही आत्मा का सार है और ध्यान इस सत्य को पुनः खोजने का मार्ग है। बाहरी जगत शोर, इच्छाओं, तुलना और विकर्षणों से भरा हुआ है। यह अव्यवस्था मन को अशांत रखती है और हमें भीतर की मौनता का अनुभव करने से रोकती है। मन गतिविधि में जीता है, लेकिन आत्मा स्थिरता में। जब हम ध्यान के माध्यम से बाहरी अव्यवस्था को छोड़ना सीखते हैं, तो हम आत्मा में विश्राम करने लगते हैं। और इस विश्राम में आनंद स्वतः प्रकट होता है। समर्पण ध्यान का अभ्यास समर्पण का अभ्यास है। जब साधक मौन में बैठकर सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है, तो मन की चंचलता मिटने लगती है। सतगुरु की तरंगें चेतना को शुद्ध करती हैं, अहं...

अपनी आवाज़ खोजो – भीतर की मौन धारा

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  Photo Credit: Facebook अपनी आवाज़ खोजो – भीतर की मौन धारा आधुनिक दुनिया के शोर में हम अक्सर सबसे महत्वपूर्ण ध्वनि—भीतर की आवाज़—से कट जाते हैं। बाहरी अपेक्षाएँ, विचारों का कोलाहल, और निरंतर विकर्षण हमें इस सूक्ष्म मार्गदर्शक उपस्थिति से दूर कर देते हैं। यह आवाज़ ऊँची नहीं होती, न ही बाहरी कोलाहल से प्रतिस्पर्धा करती है। यह कोमल, स्थिर और सतत प्रवाहित रहने वाली एक अंतर्धारा है। इसे सुनने के लिए पहले मौन पाना आवश्यक है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग , जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी सिखाते हैं, इस अंतःस्वर को पुनः खोजने का मार्ग प्रदान करता है। ध्यान, समर्पण और नियमित साधना के माध्यम से साधक बाहरी अव्यवस्था को साफ करता है और आत्मा की सूक्ष्म तरंगों से जुड़ना सीखता है। यह प्रक्रिया कोई नई आवाज़ रचने की नहीं, बल्कि उस आवाज़ को उजागर करने की है जो सदैव भीतर उपस्थित रही है—बस शोर में दब जाती थी। स्वामीजी समझाते हैं कि मन बाहर से भरे हुए प्रभावों के कारण चंचल रहता है। वह इच्छाओं, भय और तुलना में उलझकर लगातार प्रतिक्रिया करता है। इस अवस्था में भीतर की आवाज़ दब जाती है। परंतु जब साधक ध्यान में बै...

तीसरी आँख कोई आँख नहीं है

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  Photo Credit: Psyog Space तीसरी आँख कोई आँख नहीं है “तीसरी आँख” की धारणा सदियों से साधकों को आकर्षित करती रही है। इसे अक्सर एक रहस्यमयी दृष्टि अंग माना जाता है। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, तीसरी आँख वास्तव में कोई आँख नहीं है। यह दृश्य देखने का साधन नहीं, बल्कि अहंकार से मुक्त होकर चेतना के जागरण का प्रतीक है। तीसरी आँख का खुलना तभी संभव है जब अहंकार पूरी तरह मिट जाए। अहंकार ही वह परदा है जो चेतना को ढक देता है। जब मन शून्य और मौन हो जाता है, तब तीसरी आँख खुलती है—देखने के लिए नहीं, बल्कि ऊर्जा स्तर पर अनुभव करने के लिए। समर्पण ध्यान में जब साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है, तो सतगुरु की तरंगें भीतर को शुद्ध करती हैं। विचारों से भरा मन धीरे-धीरे खाली होता है। इस शून्यता में साधक ऊर्जा और सूक्ष्म वास्तविकताओं को अनुभव करने लगता है। तीसरी आँख कोई दृश्य नहीं दिखाती, बल्कि सत्य का अनुभव कराती है। सामूहिक ध्यान इस प्रक्रिया को और गहरा करता है। सामूहिक ऊर्जा अहंकार को शीघ्रता से मिटाती है और साधक को चेतना के...

जीवन का अनुभव भीतर से आकार लेता है

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  Photo Credit: Facebook जीवन का अनुभव भीतर से आकार लेता है जीवन अक्सर बाहरी परिस्थितियों से आकार लेता हुआ प्रतीत होता है—पर्यावरण, संबंध, सफलता और असफलता। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, जीवन का वास्तविक अनुभव भीतर से आकार लेता है। बाहरी घटनाएँ हमें परिभाषित नहीं करतीं, बल्कि हमारी आंतरिक चेतना की अवस्था यह तय करती है कि हम उन्हें कैसे देखते और स्वीकारते हैं। जब मन हावी होता है, तो जीवन अशांत और प्रतिक्रियात्मक लगता है। लेकिन ध्यान के माध्यम से आत्मा जागृत होती है, तो अनुभव शांत, सामंजस्यपूर्ण और सार्थक हो जाते हैं। नियमित ध्यान इस रूपांतरण की कुंजी है। जब साधक प्रतिदिन मौन में बैठकर सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को समर्पित करता है, तो सतगुरु की ऊर्जा भीतर को शुद्ध करती है। अहंकार मिटता है, मन शांत होता है और आत्मा प्रकाशित होती है। धीरे-धीरे साधक का व्यक्तित्व भीतर की चेतना से आकार लेने लगता है। सामूहिक ध्यान इस प्रक्रिया को और गहरा करता है। सामूहिक ऊर्जा साधक को एकता, करुणा और सामंजस्य का अनुभव कराती है। वहीं, एकांत ध्यान ...

करुणा – केवल दया नहीं, बल्कि सर्वसमावेशी उत्कटता

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  Photo Credit: Instagram करुणा – केवल दया नहीं, बल्कि सर्वसमावेशी उत्कटता सामान्य भाषा में करुणा को अक्सर दया या सहानुभूति समझा जाता है। हम इसे किसी ज़रूरतमंद की मदद करने या दुख के समय सहानुभूति दिखाने के रूप में देखते हैं। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, करुणा इससे कहीं अधिक गहरी है। यह केवल दया नहीं, बल्कि सर्वसमावेशी उत्कटता है—एक ऐसी शक्ति जो जीवन को समेट लेती है और हमें सभी प्राणियों से जोड़ती है। दया परिस्थितिजन्य होती है। करुणा परिस्थितियों से परे है। यह आत्मा की अवस्था है, जो निरंतर प्रवाहित होती है। करुणा किसी का चुनाव नहीं करती, वह सभी को अपनाती है—मानव, पशु, वनस्पति, नदियाँ, पर्वत और अस्तित्व की सूक्ष्म ऊर्जा तक। समर्पण ध्यान में जब साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है, तो सतगुरु की तरंगें चेतना को शुद्ध करती हैं। अहंकार मिटता है और करुणा जागृत होती है। साधक अनुभव करता है कि करुणा केवल भाव नहीं, बल्कि आत्मा की उत्कटता है। सामूहिक ध्यान करुणा को और गहरा करता है। जब साधक एकत्र होते हैं, तो करुणा की सा...

प्रेम के बिना आत्म-अन्वेषण शुष्क है

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  Photo Credit:  Instagram प्रेम के बिना आत्म-अन्वेषण शुष्क है आत्म-अन्वेषण को अक्सर आत्म-साक्षात्कार का सर्वोच्च मार्ग कहा जाता है। यह भीतर जाकर पूछने की प्रक्रिया है—“मैं कौन हूँ?”—और शरीर व मन से परे आत्मा को खोजने का प्रयास है। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, प्रेम के बिना आत्म-अन्वेषण शुष्क है। बिना भक्ति, करुणा और सभी प्राणियों—जड़ और चेतन—के प्रति निःस्वार्थ प्रेम के, यह केवल बौद्धिक और अधूरा रह जाता है। प्रेम आत्मा की सुगंध है। यह मन की कठोरता को नरम करता है और हृदय को समर्पण के लिए खोलता है। जब अन्वेषण प्रेम के बिना होता है, तो वह केवल बुद्धि तक सीमित रहता है। मन विश्लेषण करता है, प्रश्न करता है, लेकिन आत्मा जागृत नहीं होती। सच्चा आत्म-अन्वेषण प्रेम से ही जीवंत होता है, क्योंकि प्रेम अहंकार को मिटाकर हमें सार्वभौमिक चेतना से जोड़ता है। समर्पण ध्यान में साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है। यह केवल प्रश्न करने का नहीं, बल्कि प्रेम का कार्य है। सतगुरु करुणा और मौन का स्वरूप हैं। उनकी तरंगों से साधक सीखता है कि...

मन से परे – आत्मा की खोज

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  Photo Credit: Facebook मन से परे – आत्मा की खोज मन चंचल है। वह सोचता है, तुलना करता है और प्रतिक्रिया देता है, हमें अतीत और भविष्य में खींचता है। हम अक्सर स्वयं को मन की गतिविधियों से जोड़ लेते हैं। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, मन हमारा वास्तविक स्वरूप नहीं है। मन से परे जाना ही आत्मा को पाना है—वह शाश्वत चेतना जो विचारों और पहचान से परे है। यह पारगमन बलपूर्वक नहीं होता। मन को मन से शांत नहीं किया जा सकता। यह केवल निःशर्त समर्पण से मिटता है। समर्पण ध्यान में साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है। यह नियंत्रण नहीं, बल्कि खुलापन है। सतगुरु की ऊर्जा प्रवाहित होती है और धीरे-धीरे मन की पकड़ ढीली होती है, आत्मा प्रकाशित होती है। स्वामीजी बताते हैं कि मार्ग पर स्थिरता, नियमितता और समर्पण आवश्यक हैं। मुक्ति क्षणिक प्रयास से नहीं, बल्कि निरंतर साधना और सतगुरु पर विश्वास से मिलती है। सामूहिक ध्यान में मौन की तरंगें बढ़ जाती हैं। प्रत्येक साधक ऊर्जा में योगदान देता है और उससे प्राप्त करता है। वहीं, एकांत ध्यान साधक क...