सच्चा सुख केवल आत्मा से आता है
सच्चा सुख केवल आत्मा से आता है
सुख की खोज में अधिकांश लोग बाहर की ओर देखते हैं—संपत्ति, उपलब्धियाँ, संबंध या भौतिक सुखों की ओर। ये स्रोत क्षणिक आनंद दे सकते हैं, लेकिन स्थायी नहीं होते। भौतिक सुख अस्थायी है; परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है। शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं कि सच्चा सुख केवल आत्मा से आता है। यह बाहरी जगत पर निर्भर नहीं है, बल्कि भीतर से स्वतः प्रवाहित होता है।
स्वामीजी समझाते हैं कि आत्मा हमारे अस्तित्व का शाश्वत केंद्र है। यह मन के उतार-चढ़ाव और जीवन की परिस्थितियों से अछूता रहता है। जब हम शरीर या अहंकार से पहचान करते हैं, तो सुख नाजुक हो जाता है। लेकिन जब हम आत्मा में विश्राम करते हैं, तो सुख स्थिर, उज्ज्वल और निःशर्त हो जाता है।
ध्यान इस आंतरिक आनंद का द्वार है। समर्पण ध्यान में साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है। मन शांत होता है, अहंकार मिटता है और आत्मा जागृत होती है। इस जागृत अवस्था में सुख बाहर नहीं खोजा जाता, बल्कि भीतर पाया जाता है। आत्मा का आनंद क्षणिक नहीं, बल्कि स्थायी है, क्योंकि यह शुद्ध चेतना से उत्पन्न होता है।
भौतिक सुख समय से बँधा होता है। नई वस्तु कुछ समय के लिए उत्साह देती है, फिर वह उत्साह मिट जाता है। उपलब्धियाँ गर्व देती हैं, लेकिन गर्व नाजुक होता है। संबंध आराम देते हैं, लेकिन वे दुख भी दे सकते हैं। स्वामीजी बताते हैं कि भौतिक सुख जीवन का हिस्सा हैं, पर वे स्थायी संतोष नहीं दे सकते। केवल आत्मा ही दे सकती है।
पूर्ण समर्पण—सतगुरु के प्रति निःशर्त आत्म-निवेदन—भौतिक सुख से ऊपर उठकर आत्मा के आनंद में प्रवेश की कुंजी है। अहंकार बाहर सुख खोजता है, लेकिन समर्पण अहंकार को मिटा देता है। जब साधक पूर्ण समर्पण करता है, तो सतगुरु की तरंगें चेतना को शुद्ध करती हैं और आत्मा प्रकाशित होती है। इस अवस्था में सुख परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहता। यह आत्मा की स्वाभाविक सुगंध है।
सामूहिक ध्यान इस अनुभव को गहरा करता है। साधकों के बीच बैठने से सामूहिक मौन का शक्तिशाली क्षेत्र निर्मित होता है। अहंकार, जो अलगाव पर जीवित रहता है, इस वातावरण में टिक नहीं पाता। साधक समर्थित और उन्नत अनुभव करता है और गहरे आनंद में प्रवेश करता है। वहीं, एकांत ध्यान भी उतना ही आवश्यक है। एकांत में साधक मन की सूक्ष्म गतिविधियों का सामना करता है और उन्हें सतगुरु को समर्पित करता है। सामूहिक और एकांत ध्यान दोनों ही सच्चे सुख को खोजने के लिए आवश्यक हैं।
स्वामीजी बताते हैं कि सच्चा सुख कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि पुनः खोज है। यह सदैव उपस्थित रहा है, जैसे बादलों के पीछे छिपा सूर्य। ध्यान अहंकार और इच्छाओं के बादलों को हटाता है और आत्मा के उज्ज्वल आनंद को प्रकट करता है। यह आनंद मौन, शांति और प्रसन्नता है। यह बाहरी शोर से प्रभावित नहीं होता; यह भीतर से प्रवाहित होता है, स्थिर और शाश्वत।
अंततः, सच्चा सुख केवल आत्मा से आता है। भौतिक सुख मिट जाते हैं, लेकिन आत्मा का आनंद स्थायी रहता है। निःशर्त समर्पण, ध्यान और सतगुरु के मार्गदर्शन से साधक बाहरी सुख से ऊपर उठकर आंतरिक आनंद को खोज सकता है। यही मुक्ति है—संसार से पलायन नहीं, बल्कि उससे स्वतंत्रता। साधक संसार में जीता है, लेकिन सुख भीतर से प्रवाहित होता है—उज्ज्वल और अडिग।

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