तीसरी आँख कोई आँख नहीं है
तीसरी आँख कोई आँख नहीं है
“तीसरी आँख” की धारणा सदियों से साधकों को आकर्षित करती रही है। इसे अक्सर एक रहस्यमयी दृष्टि अंग माना जाता है। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, तीसरी आँख वास्तव में कोई आँख नहीं है। यह दृश्य देखने का साधन नहीं, बल्कि अहंकार से मुक्त होकर चेतना के जागरण का प्रतीक है।
तीसरी आँख का खुलना तभी संभव है जब अहंकार पूरी तरह मिट जाए। अहंकार ही वह परदा है जो चेतना को ढक देता है। जब मन शून्य और मौन हो जाता है, तब तीसरी आँख खुलती है—देखने के लिए नहीं, बल्कि ऊर्जा स्तर पर अनुभव करने के लिए।
समर्पण ध्यान में जब साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है, तो सतगुरु की तरंगें भीतर को शुद्ध करती हैं। विचारों से भरा मन धीरे-धीरे खाली होता है। इस शून्यता में साधक ऊर्जा और सूक्ष्म वास्तविकताओं को अनुभव करने लगता है। तीसरी आँख कोई दृश्य नहीं दिखाती, बल्कि सत्य का अनुभव कराती है।
सामूहिक ध्यान इस प्रक्रिया को और गहरा करता है। सामूहिक ऊर्जा अहंकार को शीघ्रता से मिटाती है और साधक को चेतना के सूक्ष्म आयाम का अनुभव कराती है। वहीं, एकांत ध्यान साधक को मन का सीधा सामना करने और गहरे समर्पण का अवसर देता है। दोनों ही ध्यान तीसरी आँख के जागरण के लिए आवश्यक हैं।
तीसरी आँख कोई रहस्यमयी अंग नहीं, बल्कि आंतरिक रूपांतरण का रूपक है। यह शरीर चेतना से आत्मा चेतना की ओर, अहंकार से समर्पण की ओर, विचार से मौन की ओर यात्रा का प्रतीक है। जब मन शून्य होता है, तो साधक आँखों से नहीं, आत्मा से अनुभव करता है। यही अनुभव प्रकाश है—चेतना का प्रकाश, जो अस्तित्व की एकता को प्रकट करता है।
स्वामीजी बताते हैं कि मुक्ति इस जागरण का स्वाभाविक परिणाम है। तीसरी आँख खुलने पर साधक समझता है कि जीवन बाहरी रूपों का नहीं, बल्कि आंतरिक सत्य का है। अहंकार मिटता है, मन शांत होता है और आत्मा प्रकाशित होती है। इस अवस्था में मौन और आनंद साधक का स्वभाव बन जाते हैं। तीसरी आँख कोई आँख नहीं है—यह चेतना का जागरण है, मुक्ति का द्वार है।

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