भाग्य क्या है?
भाग्य क्या है?
भाग्य मानव जीवन का सबसे गहन प्रश्न है। हम अक्सर सोचते हैं कि क्या हमारा जीवन पूर्वनिर्धारित है या हमारे कर्मों से निर्मित होता है। हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की दृष्टि से, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, भाग्य और कर्म गहराई से जुड़े हुए हैं। भाग्य वास्तव में कर्म का ही unfold होना है—इस जन्म और पिछले जन्मों के कर्मों का परिणाम।
कर्म कारण और परिणाम का नियम है। हर विचार, हर वचन और हर कर्म हमारी चेतना में संस्कार उत्पन्न करता है। यही संस्कार हमारे अनुभवों को आकार देते हैं, जिसे हम भाग्य कहते हैं। जीवन में मिलने वाले सुख और दुख आकस्मिक नहीं होते, वे कर्म के फल होते हैं। लेकिन स्वामीजी बताते हैं कि भाग्य डरने की चीज़ नहीं है। यह एक शिक्षक है, जो हमें आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
जब साधक सतगुरु से दीक्षा लेता है, तो एक गहन रूपांतरण होता है। स्वामीजी बताते हैं कि इस जन्म का कर्म उसी क्षण निष्प्रभावी हो जाता है। साधक अब वर्तमान जन्म के कर्म का बोझ नहीं उठाता। शेष रहता है केवल पिछले जन्मों का कर्म, जिसे सहना पड़ता है। लेकिन यदि साधक पूर्ण समर्पण करता है, तो उस कर्म का प्रभाव भी अनुभव नहीं होता। सतगुरु की ऊर्जा साधक को ढाल की तरह सुरक्षा देती है, जिससे वह बाहरी परिस्थितियों के बीच भी शांति और मौन में जीता है।
यही समर्पण की शक्ति है। भाग्य चलता रहता है, लेकिन उसका प्रभाव मिट जाता है। साधक साक्षी बन जाता है—संसार में जीते हुए भी उससे अछूता रहता है। बाहरी घटनाएँ घटती रहती हैं, लेकिन भीतर मौन और आनंद बना रहता है। यह भाग्य से पलायन नहीं, बल्कि उसका अतिक्रमण है।
ध्यान इस अनुभव को संभव बनाता है। समर्पण ध्यान में साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है। मन की चंचलता शांत होती है, अहंकार मिटता है और आत्मा जागृत होती है। इस जागृत अवस्था में भाग्य की पकड़ ढीली हो जाती है। साधक अनुभव करता है कि वह शरीर नहीं है, मन नहीं है, कर्म नहीं है—वह शाश्वत आत्मा है।
स्वामीजी बताते हैं कि भाग्य केवल तब तक वास्तविक है जब तक हम अहंकार से पहचान करते हैं। जब हम आत्मा-चेतना में जीते हैं, तो भाग्य अप्रासंगिक हो जाता है। जीवन सहज रूप से प्रवाहित होता है, कर्म से नहीं बल्कि सतगुरु की कृपा से संचालित होता है। साधक स्वतंत्रता, मौन और आनंद का अनुभव करता है।
इस प्रकार, भाग्य और कर्म जुड़े हुए हैं, लेकिन वे अंतिम सत्य नहीं हैं। सतगुरु को पूर्ण समर्पण करने पर भाग्य हमें बाँध नहीं सकता। कर्म रहता है, लेकिन उसका प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है। साधक संसार में जीते हुए भी मुक्ति का अनुभव करता है। यही समर्पण का सार है—भाग्य से ऊपर उठकर आत्मा में विश्राम करना।

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