दो विचारों के बीच का अंतराल ही ध्यान है

 

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दो विचारों के बीच का अंतराल ही ध्यान है

मानव मन एक चंचल साधन है। यह निरंतर विचार उत्पन्न करता रहता है—अतीत की स्मृतियाँ, भविष्य की कल्पनाएँ, इच्छाएँ, भय और निर्णय। यह निरंतर कोलाहल हमें भीतर की मौनता का अनुभव करने से रोकता है। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग की परंपरा में, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, ध्यान विचारों से लड़ने का नाम नहीं है, बल्कि उनके बीच के अंतराल को खोजने का मार्ग है। वही अंतराल शुद्ध मौन है और उसी मौन में आनंद छिपा है।

जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो सबसे पहले मन की बातें सुनाई देती हैं। विचार एक के बाद एक उठते हैं, जैसे समुद्र की लहरें। प्रारंभ में लगता है कि उन्हें रोकना असंभव है। लेकिन स्वामीजी बताते हैं कि लक्ष्य विचारों को दबाना नहीं है। हमें केवल उन्हें देखना है। जब हम बिना आसक्ति के देखते हैं, तो विचारों का प्रवाह धीमा होने लगता है। दो विचारों के बीच एक अंतराल प्रकट होता है—स्थिरता का स्थान।

यही अंतराल ध्यान है। यही आत्मा का द्वार है। उस स्थान में मन शून्य हो जाता है, अहंकार मिट जाता है और आत्मा प्रकाशित होती है। बाहरी जगत का शोर चलता रहता है, लेकिन भीतर मौन स्थापित हो जाता है। साधक साक्षी बन जाता है—भौतिक जगत में जीते हुए भी भीतर शांति का अनुभव करता है।

समर्पण ध्यान इस अनुभव को संभव बनाता है। जब साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है, तो मन की चंचलता धीरे-धीरे शांत होती है। सतगुरु की तरंगें चेतना को शुद्ध करती हैं और अहंकार की परतें मिटती हैं। धीरे-धीरे साधक लंबे और गहरे अंतराल का अनुभव करने लगता है। उन अंतरालों में मौन फैलता है और आनंद स्वतः उत्पन्न होता है।

सामूहिक ध्यान इस प्रक्रिया को और गहरा करता है। साधकों के बीच बैठने से सामूहिक मौन का शक्तिशाली क्षेत्र निर्मित होता है। इस वातावरण में मन को छोड़ना सरल हो जाता है और विचारों के बीच का अंतराल अधिक स्पष्ट हो जाता है। वहीं, एकांत ध्यान साधक को गहरे आत्म-समर्पण का अवसर देता है। सामूहिक और एकांत ध्यान दोनों ही विचारों के बीच मौन को अनुभव करने के लिए आवश्यक हैं।

स्वामीजी बताते हैं कि यह मौन शून्यता नहीं है, बल्कि पूर्णता है। यह आत्मा की उपस्थिति है, जो परिस्थितियों से अछूती रहती है और शांति व आनंद से प्रकाशित होती है। जब साधक इस मौन में विश्राम करता है, तो जीवन रूपांतरित हो जाता है। बाहरी शोर चलता रहता है, लेकिन वह अब बाधा नहीं बनता। साधक संसार में जीता है, पर आत्मा का अनुभव करता है। यही संतुलन ध्यान का सार है।

अंततः, दो विचारों के बीच का अंतराल हमें हमारा वास्तविक स्वरूप दिखाता है। यह हमें बताता है कि हम मन नहीं हैं, न विचारों का शोर हैं, न अहंकार हैं। हम वह मौन हैं जो सभी विचारों के नीचे प्रवाहित होता है। हम साक्षी हैं, शाश्वत चेतना हैं। नियमित ध्यान, सतगुरु को समर्पण और स्थिर साधना के माध्यम से साधक इस सत्य को खोजता है। और इस खोज में आनंद प्रकट होता है तथा मुक्ति का अनुभव होता है।

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