अहंकार – आत्मा और शुद्ध चेतना के बीच की गाँठ

 

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अहंकार – आत्मा और शुद्ध चेतना के बीच की गाँठ

आध्यात्मिक यात्रा का सार अहंकार का विलय है। अहंकार वह गाँठ है जो व्यक्ति को भ्रम से बाँधती है और आत्मा को शुद्ध चेतना से जुड़ने से रोकती है। यह वह बाधा है जो दृष्टि को विकृत करती है और आत्मा तथा अनंत के बीच अलगाव उत्पन्न करती है। जब तक अहंकार है, आत्मा शुद्ध चेतना के विशाल विस्तार में नहीं जुड़ सकती।

अहंकार अनेक सूक्ष्म रूपों में प्रकट होता है—गर्व, भय, इच्छा, निर्णय और आसक्ति। यह निरंतर बदलता रहता है ताकि अपनी पकड़ बनाए रखे। यहाँ तक कि साधना में भी अहंकार उपलब्धि या श्रेष्ठता के रूप में छिप सकता है। यही कारण है कि अहंकार को मार्ग की सबसे बड़ी बाधा माना जाता है। इसे मिटाने के लिए आंशिक प्रयास नहीं, बल्कि पूर्ण और निःशर्त समर्पण आवश्यक है।

हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, अहंकार को पार करने की कुंजी समर्पण है। जब साधक ध्यान में बैठकर सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है, तो सतगुरु की तरंगें चेतना को शुद्ध करती हैं। अहंकार, जो नियंत्रण और विरोध पर जीवित रहता है, धीरे-धीरे अपनी पकड़ खो देता है। गाँठ ढीली होने लगती है और आत्मा स्वतंत्रता का अनुभव करती है।

स्वामीजी बताते हैं कि अहंकार आत्मा पर पड़ा हुआ एक आवरण है। यह हमें शरीर, मन और बाहरी जगत से जोड़ता है। लेकिन आत्मा इन सबसे परे है। आत्मा शुद्ध चेतना है—अनंत और शाश्वत। जब अहंकार मिटता है, तो आवरण हट जाता है और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकाशित होती है। यह कोई नई उपलब्धि नहीं, बल्कि उस सत्य का पुनः अनुभव है जो सदैव उपस्थित था।

सामूहिक ध्यान इस प्रक्रिया को तीव्र करता है। साधकों के बीच बैठने से सामूहिक ऊर्जा का शक्तिशाली क्षेत्र निर्मित होता है। अहंकार, जो अलगाव और व्यक्तित्व पर जीवित रहता है, इस एकता के वातावरण में टिक नहीं पाता। वहीं, एकांत ध्यान भी उतना ही आवश्यक है। एकांत में साधक अहंकार की सूक्ष्म गतिविधियों का सीधा सामना करता है और उन्हें सतगुरु को समर्पित करता है। सामूहिक और एकांत ध्यान दोनों ही इस गाँठ को खोलने के लिए आवश्यक हैं।

अहंकार का विलय बौद्धिक प्रक्रिया नहीं है। इसे विश्लेषण या प्रयास से नहीं मिटाया जा सकता। अहंकार केवल कृपा से मिटता है। साधक का कार्य केवल पूर्ण समर्पण करना है—बिना शर्त, बिना आरक्षण। जब समर्पण पूर्ण होता है, तो सतगुरु की ऊर्जा चेतना को रूपांतरित करती है। अहंकार गिर जाता है और आत्मा शुद्ध चेतना में विलीन हो जाती है।

इस अवस्था में मौन और आनंद स्वतः उत्पन्न होते हैं। साधक अब विचारों, भावनाओं या बाहरी परिस्थितियों से नहीं जुड़ता। जीवन साक्षी भाव से जीया जाता है, अस्तित्व के साथ सामंजस्य में बहता है। बाहरी जगत चलता रहता है, लेकिन भीतर केवल शांति रहती है। अहंकार से मुक्त आत्मा शुद्ध चेतना के साथ एकत्व का अनुभव करती है। यही एकत्व मुक्ति है—आध्यात्मिक साधना का परम लक्ष्य।

इस प्रकार, अहंकार आत्मा और शुद्ध चेतना के बीच की गाँठ है। यह वह बाधा है जिसे मिटाना आवश्यक है ताकि आत्मा जागृत हो सके। निःशर्त समर्पण, ध्यान में आत्म-समर्पण और सतगुरु के मार्गदर्शन से यह गाँठ खुल जाती है। तब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में विश्राम करती है—शुद्ध चेतना, मौन, आनंद और मुक्ति।

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