प्रेम के बिना आत्म-अन्वेषण शुष्क है
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प्रेम के बिना आत्म-अन्वेषण शुष्क है
आत्म-अन्वेषण को अक्सर आत्म-साक्षात्कार का सर्वोच्च मार्ग कहा जाता है। यह भीतर जाकर पूछने की प्रक्रिया है—“मैं कौन हूँ?”—और शरीर व मन से परे आत्मा को खोजने का प्रयास है। लेकिन हिमालयीन समर्पण ध्यानयोग में, जैसा कि शिवकृपानंद स्वामीजी बताते हैं, प्रेम के बिना आत्म-अन्वेषण शुष्क है। बिना भक्ति, करुणा और सभी प्राणियों—जड़ और चेतन—के प्रति निःस्वार्थ प्रेम के, यह केवल बौद्धिक और अधूरा रह जाता है।
प्रेम आत्मा की सुगंध है। यह मन की कठोरता को नरम करता है और हृदय को समर्पण के लिए खोलता है। जब अन्वेषण प्रेम के बिना होता है, तो वह केवल बुद्धि तक सीमित रहता है। मन विश्लेषण करता है, प्रश्न करता है, लेकिन आत्मा जागृत नहीं होती। सच्चा आत्म-अन्वेषण प्रेम से ही जीवंत होता है, क्योंकि प्रेम अहंकार को मिटाकर हमें सार्वभौमिक चेतना से जोड़ता है।
समर्पण ध्यान में साधक सहस्रार पर चित्त को गुरु तत्व को अर्पित करता है। यह केवल प्रश्न करने का नहीं, बल्कि प्रेम का कार्य है। सतगुरु करुणा और मौन का स्वरूप हैं। उनकी तरंगों से साधक सीखता है कि अन्वेषण मन से नहीं, हृदय से करना है। इस प्रकार आत्म-अन्वेषण जीवंत हो जाता है, भक्ति और कृपा से प्रवाहित होता है।
सामूहिक ध्यान इस प्रक्रिया को और गहरा करता है। जब साधक एकत्र होते हैं, तो प्रेम और समर्पण की सामूहिक ऊर्जा एक शक्तिशाली चेतना क्षेत्र बनाती है। इस वातावरण में आत्म-अन्वेषण शुष्क नहीं रहता, बल्कि साझा भक्ति की ऊष्मा से पोषित होता है। वहीं, एकांत ध्यान साधक को मन का सीधा सामना करने और भीतर प्रेम को साथी बनाने का अवसर देता है।
जैसे-जैसे साधक स्थिर और नियमित रहता है, सूक्ष्म रूपांतरण होता है। मन धीरे-धीरे विलीन होता है। शेष रहता है चेतना का विशाल विस्तार—शुद्ध मौन और आनंद। यह मौन शुष्क नहीं, बल्कि प्रेम से जीवंत है। आत्मा में विश्राम का आनंद परिस्थितियों पर निर्भर नहीं, बल्कि भीतर से उत्पन्न होता है।
स्वामीजी बताते हैं कि मुक्ति केवल बौद्धिक अन्वेषण से नहीं मिलती। यह तब मिलती है जब अन्वेषण प्रेम, भक्ति और समर्पण से भरा हो। प्रेम अन्वेषण को उर्वर बनाता है, करुणा उसे व्यापक करती है और भक्ति उसे रूपांतरित करती है। यही साधक को मन से परे आत्मा तक ले जाती है।
इस प्रकार शिक्षा स्पष्ट है: प्रेम के बिना आत्म-अन्वेषण शुष्क है। प्रेम के साथ यह मुक्ति का जीवंत मार्ग बन जाता है। निःशर्त समर्पण, सामूहिक और एकांत ध्यान, और सतगुरु के मार्गदर्शन से साधक शुष्कता को पार करता है और मौन व आनंद की अवस्था में मुक्ति का अनुभव करता है।

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