भक्ति: बुद्धिमत्ता का एक आयाम

 

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भक्ति: बुद्धिमत्ता का एक आयाम

ज्ञान की आधुनिक खोज में बुद्धि (इंटेलेक्ट) को ही अक्सर सर्वोच्च मानवीय क्षमता मान लिया जाता है। हम विश्लेषण, वर्गीकरण और तर्कों में उलझे रहते हैं, यह सोचकर कि केवल विश्लेषणात्मक विचार ही जीवन के रहस्यों को खोल सकता है। किंतु बुद्धि की अपनी सीमाएं हैं; वह एक फूल की पंखुड़ियों को गिनने के लिए उसे काट तो सकती है, पर उसकी सुगंध का अनुभव कभी नहीं कर सकती। बुद्धि सत्य को दूर से जीतकर उस पर अधिकार पाना चाहती है, जबकि भक्ति बुद्धिमत्ता के एक भिन्न और विराट आयाम से संचालित होती है—यह सत्य को जीतने की कोशिश नहीं करती, बल्कि उसे अंगीकार कर साक्षात अनुभव करती है।

मूल रूप से, भक्ति योग का अर्थ है मानवीय भावनाओं की तीव्रता का उपयोग करके अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से परे जाना। जहां हमारा शरीर और तार्किक मन तीव्रता की उच्च अवस्था को लंबे समय तक बनाए रखने में संघर्ष करते हैं, वहीं भावनाएं एक ही क्षण में प्रचंड वेग पकड़ सकती हैं। जब वही भावनात्मक ऊर्जा सांसारिक वासनाओं या शिकायतों में बहती है, तो बंधन बन जाती है। किंतु जब उसी तीव्रता को अंतर्मुखी कर परमात्मा की ओर मोड़ दिया जाता है, तो वह आत्मिक रूपांतरण का सबसे तीव्र साधन बन जाती है।

श्री शिवकृपानंद स्वामीजी जैसे आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु के सान्निध्य में यह पथ अपनाना जीवन जीने का सबसे विवेकपूर्ण तरीका है। मानवीय बुद्धि संशय, अहंकार और अति-विचार के अंतहीन चक्रों में भटकती रहती है। केवल मन के सहारे अहंकार को जीतना वैसा ही है जैसे चोर को ही पहरेदार बना देना। इस विराट ब्रह्मांड में अपनी लघुता को पहचानकर अपनी बुद्धि को सद्गुरु के चरणों में अर्पित कर देना अंधविश्वास या दुर्बलता नहीं, बल्कि जागरूक विवेक की पराकाष्ठा है।

इस मार्ग पर सच्ची भक्ति का अर्थ है गुरुदेव के श्रीचरणों में पूर्ण, अकपट समर्पण। जब कोई साधक हिमालयन समर्पण ध्यान में बैठकर स्वामीजी के पावन चरणों को अपने चित्त में श्रद्धापूर्वक स्थापित करता है, तो अंतर्मन का कोलाहल स्वतः शांत हो जाता है। बुद्धि के अंतहीन तर्क, पुराने संस्कार और मानसिक पहचानें विलीन होने लगती हैं। इस निष्कपट समर्पण में मन अपने भटकाव को छोड़ एक गहन शून्य—परम शांति और नीरवता की अवस्था—में प्रवेश कर जाता है।

इसी पावन शून्य में रूपांतरण का चमत्कार घटित होता है। जब अहंकार और भय से अंतःकरण रिक्त हो जाता है, तो कृपा के उतरने का अनंत स्थान बन जाता है। व्यक्तिगत चेतना सहज ही सार्वभौमिक चेतना के असीम सागर में एकाकार हो जाती है। इस मिलन में व्यक्ति केवल प्रेम को समझता ही नहीं, बल्कि स्वयं विशुद्ध प्रेम ऊर्जा से सराबोर हो जाता है। भक्त और भक्ति का भेद समाप्त हो जाता है और आप स्वयं वही प्रेम बन जाते हैं।

यह आंतरिक रूपांतरण केवल बंद आंखों तक सीमित नहीं रहता; यह आपके आभामंडल (ऑरा) के माध्यम से बाहर संसार में भी विकिरणित होता है। समर्पित साधक सद्गुरु के दिव्य चैतन्य का एक निर्मल माध्यम बन जाता है। आपकी भक्ति की शुद्धता आपके आभामंडल को सकारात्मक, शांत और प्रेमपूर्ण ऊर्जा से भर देती है।

जो लोग आपके संपर्क में आते हैं—चाहे वे सहकर्मी हों, परिवारजन हों या अजनबी—वे अनकहे ही इस शांति और आकर्षण को महसूस करते हैं। बिना किसी उपदेश या शास्त्रार्थ के, आपकी उपस्थिति मात्र से लोग सुकून और खिंचाव अनुभव करते हैं। अपनी भावनाओं को पूर्ण समर्पण से जोड़कर सद्गुरु को हृदय में धारण कर लेना ही जीवन की सर्वोच्च और सबसे गहरी बुद्धिमत्ता है।

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