क्या हम वर्तमान में हैं?
क्या हम वर्तमान में हैं?
शुरुआत करने के लिए यहाँ एक अजीब सा सवाल है: पिछली बार आपने कब स्नान किया था—और सचमुच केवल स्नान ही किया था? या किसी आम दोपहर में अपनी त्वचा पर धूप की गर्माहट को महसूस किया था?
हममें से अधिकांश लोगों को यह याद करने में कठिनाई होगी। जब कंधे पर पानी बहता है, तब हमारा मन मीलों दूर होता है—आने वाली बैठक की तैयारी कर रहा होता है, दिमाग में किसी सहकर्मी से बहस कर रहा होता है, या कल की गलतियों की समीक्षा कर रहा होता है। जब धूप हमारे चेहरे को छूती है, तब हम बढ़ती हुई कार्यों की सूची में उलझे होते हैं और जेब में फोन थरथरा रहा होता है। हम न उस गर्माहट के लिए वहाँ मौजूद थे, न अपनी सांसों के लिए, और न ही अपनी त्वचा के अहसास के लिए।
हम अपने शरीर में तो रहते हैं, पर उस क्षण में शायद ही कभी होते हैं। आधुनिक जीवन की विडंबना यह है कि हम शारीरिक रूप से तो वर्तमान में हैं, पर मानसिक रूप से कहीं खोए हुए हैं। मन एक अशांत पेंडुलम की तरह काम करता है, जो अतीत के पछतावे, अपराधबोध और संस्कारों तथा भविष्य की चिंताओं, अनुमानों और महत्वाकांक्षाओं के बीच लगातार झूलता रहता है। ऐसा करते हुए, हम वास्तविक जीवन को पूरी तरह छोड़ देते हैं। फिर भी, नहाना, पानी पीना या हवा की सरसराहट सुनना जैसी साधारण सी क्रिया भी तुरंत ध्यान बन सकती है—बशर्ते हम सचमुच वहाँ उपस्थित हों।
चुनौती यह है कि हम केवल इच्छाशक्ति के बल पर मन को वर्तमान में रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। बुद्धि बुद्धि को शांत नहीं कर सकती; शांति के बारे में सोचकर विचारों को चुप कराने की कोशिश केवल मानसिक कोलाहल की एक और परत तैयार कर देती है।
यहीं पर आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु श्री शिवकृपानंद स्वामी (स्वामीजी) द्वारा मार्गदर्शित 'हिमालयन समर्पण ध्यान' का पावन मार्ग एक सहज समाधान प्रदान करता है। समर्पण हमें विचारों से युद्ध करने के लिए नहीं कहता। इसके बजाय, यह हमें सद्गुरु के श्रीचरणों में बिना शर्त पूर्ण समर्पण के पवित्र स्थान में आमंत्रित करता है। स्वामीजी कहते हैं कि विचारों को केवल साक्षी भाव से देखें, ठीक वैसे ही जैसे हम कोई फिल्म देख रहे हों। विचारों—जो अक्सर नकारात्मक होते हैं—से चिपकना ही हमें अतीत या भविष्य में धकेल देता है। साक्षी भाव हमें विचारों से एक दूरी प्रदान करता है, जिससे सिनेमा देखने जैसा बोध उत्पन्न होता है।
जब हम प्रातः ध्यान में बैठते हैं, तो मन से कोई संघर्ष नहीं करते; हम सहजता से अपनी चिंताओं, अहंकार और अंतहीन मानसिक बातचीत को दैवीय चेतना को सौंप देते हैं। स्वामीजी के पावन श्रीचरणों को अपने चित्त में स्थापित कर और अपना ध्यान सहस्रार चक्र पर केंद्रित करने से एक सहज नीरवता उतर आती है। विचारों की उथल-पुथल विलीन होने लगती है और 'निर्विकार समाधि'—अर्थात पूर्ण विचारशून्यता की अवस्था—का आरंभ होता है।
वर्तमान में जीना इसी विचारशून्य अवस्था का सीधा परिणाम है। जब मन का कल और कल के बीच झूलना बंद हो जाता है, तब प्राण ऊर्जा का भारी अपव्यय रुक जाता है। एक अशांत मन व्यर्थ की चिंताओं और मानसिक बड़बड़ाहट में जीवन ऊर्जा के अपार भंडार को नष्ट कर देता है। 'वर्तमान' में टिक जाने से वह बिखरी हुई ऊर्जा सुरक्षित होती है, संगठित होती है और ऊपर की ओर उठने लगती है।
इस संरक्षित, मौन अवस्था में अलगाव का भ्रम मिट जाता है। यह क्षुद्र, व्याकुल 'मैं' सार्वभौमिक चेतना के विशाल सागर में विलीन हो जाता है। हमें यह बोध होता है कि शांति कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है जिसे बाहर से पाना है; बल्कि जब हम वर्तमान से भागना बंद कर देते हैं, तो यह हमारा मूल स्वभाव बन जाती है।
इस आंतरिक मिलन के फल सहज ही हमारी दिनचर्या में छलकने लगते हैं। जब हम ध्यान के आसन से उठकर पुनः संसार में आते हैं, तो उस जीवंत उपस्थिति को अपने साथ लेकर चलते हैं। स्नान करना केवल एक यांत्रिक कार्य नहीं रह जाता—यह पूर्ण उपस्थिति का एक अनुभव बन जाता है। बातचीत अधिक गहरी हो जाती है क्योंकि हम बिना किसी आंतरिक टिप्पणी के केवल सुनते हैं। काम एक सहज क्रिया बन जाता है क्योंकि हमारा ध्यान एकाग्र होता है।
जीवन आज से दस साल बाद हमारी प्रतीक्षा नहीं कर रहा है, न ही यह अतीत की स्मृतियों में अटका हुआ है। यह इसी क्षण हमारे दिल में धड़क रहा है और हमारी सांसों में बह रहा है। सद्गुरु की जीवंत कृपा के प्रति समर्पित हों, अपनी चेतना को सहस्रार पर ठहरने दें, और अंततः वर्तमान में होने के असीम आनंद को खोजें।

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