ब्रह्मांडीय ऊर्जा से आत्मा का जुड़ाव
ब्रह्मांडीय ऊर्जा से आत्मा का जुड़ाव
ब्रह्मांडीय
ऊर्जा कोई
दूर की
बात नहीं—यह
स्वयं अस्तित्व
का सार
है। यह
हर कण, हर
श्वास, हर
क्षण में
प्रवाहित होती
है। लेकिन
अधिकांश लोग
इससे कटे
हुए रहते
हैं—मन
के शोर
और संसार
की मांगों
में उलझे
हुए। आत्मा
को ब्रह्मांडीय
ऊर्जा से
जोड़ना, अपने
स्वाभाविक स्वरूप
में लौटना
है—जाग्रत, जीवंत
और पूर्णतः
उपस्थित।
हिमालयीन
समर्पण ध्यानयोग
में स्वामी
शिवकृपानंदजी सिखाते
हैं कि
ब्रह्मांडीय ऊर्जा
सदा उपलब्ध
है। यह
समय, स्थान
या प्रयास
से सीमित
नहीं है।
लेकिन इसे
पाने के
लिए हमें
खुलना पड़ता
है। और
यह खुलापन
समर्पण से
शुरू होता
है—किसी
विचार से
नहीं, बल्कि
गुरु तत्व
की जीवंत
उपस्थिति से।
जब
हम ध्यान
में बैठते
हैं, तो
हम ऊर्जा
को उत्पन्न
नहीं कर
रहे होते—हम
उससे संरेखित
हो रहे
होते हैं।
समर्पण ध्यानयोग
की साधना
सरल है, लेकिन
गहन है।
हम अपना
चित्त सहस्रार
पर रखते
हैं और
गुरु की
ऊर्जा को
प्रवाहित होने
देते हैं।
इस समर्पण
में ब्रह्मांडीय
प्रवाह शुरू
होता है।
यह
ऊर्जा केवल
आध्यात्मिक नहीं, बल्कि
अत्यंत व्यावहारिक
भी है।
यह शरीर
को जागृत
करती है, मन
को तीव्र
बनाती है, और
हृदय को
विस्तृत करती
है। हम
अपने परिवेश
के प्रति
अधिक सजग, दूसरों
के प्रति
अधिक संवेदनशील, और
वर्तमान क्षण
में अधिक
उपस्थित हो
जाते हैं।
ब्रह्मांडीय
ऊर्जा बुद्धिमान
होती है।
यह जानती
है कहाँ
जाना है, क्या
ठीक करना
है, और
कैसे मार्गदर्शन
देना है।
जब हम
स्वयं को
इसके लिए
खोलते हैं, तो
हमें योजना
या प्रयास
की आवश्यकता
नहीं होती—हम
केवल प्राप्त
करते हैं।
और इस
प्राप्ति में
रूपांतरण होता
है—प्रयास
से नहीं, कृपा
से।
स्वामीजी
कहते हैं
कि आत्मा
एक सैटेलाइट
डिश की
तरह है।
यदि वह
असंतुलित हो, तो
संकेत नहीं
मिलते। लेकिन
जब वह
ध्यान और
समर्पण से
ठीक से
जुड़ती है, तो
ब्रह्मांडीय संदेश
प्राप्त होने
लगते हैं।
ये केवल
विचार नहीं
होते—ये
सत्य, शांति
और उद्देश्य
की तरंगें
होती हैं।
जैसे-जैसे
ध्यान गहराता
है, यह
जुड़ाव भी
गहरा होता
जाता है।
चित्त शुद्ध
होता है, मन
शांत होता
है, और
आत्मा प्रकाशित
होती है।
हम सतह
से नहीं, केंद्र
से जीने
लगते हैं।
प्रतिक्रिया नहीं, उत्तर
देने लगते
हैं। भागना
नहीं, प्रवाह
में बहना
सीखते हैं।
ब्रह्मांडीय
ऊर्जा से
जुड़ना प्रतिरोध
छोड़ने का
भी नाम
है। अहंकार
नियंत्रण, निश्चितता
और मान्यता
चाहता है।
लेकिन आत्मा
जुड़ाव, समर्पण
और मौन
चाहती है।
जब हम
सब कुछ
समझने की
आवश्यकता छोड़ते
हैं, तब
हम सब
कुछ अनुभव
करने लगते
हैं।
यह
ऊर्जा केवल
संतों या
ऋषियों के
लिए नहीं—यह
सबके लिए
उपलब्ध है।
बस एक
शर्त है—सच्चाई।
जब हम
शुद्ध हृदय
से कुछ
क्षण भी
बैठते हैं, तो
ब्रह्मांडीय ऊर्जा
प्रवाहित होने
लगती है।
हम कहाँ
हैं या
क्या जानते
हैं, यह
मायने नहीं
रखता। मायने
रखता है—प्राप्त
करने की
इच्छा।
तो
बैठिए। साँस
लीजिए। समर्पण
कीजिए। चित्त
को सहस्रार
पर रखें
और गुरु
की ऊर्जा
को प्रवाहित
होने दीजिए।
मन को
मौन में
विलीन होने
दीजिए। आत्मा
को उठने
दीजिए।
आप
केवल शांत
नहीं होंगे—आप
जीवंत होंगे।
आप केवल
स्थिर नहीं
होंगे—आप
जुड़े होंगे।
आप केवल
ध्यान नहीं
करेंगे—आप
ब्रह्मांड से
एक हो
जाएंगे।

Jai baba Swami
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